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Neelkanth Mahadev Temple: इस स्थान पर भगवान शिव ने कंठ में धारण किया था विष, जानें कहां है ये मंदिर

Wed, 16 Jul 2025 03:31 PM IST
ज्योति मेहरा ज्योतिष डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

सावन के महीने में उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले में स्थित नीलकंठ महादेव मंदिर में शिवभक्तों की भीड़ उमड़ती है। नीलकंठ महादेव मंदिर से जुड़ी पौराणिक कथा बेहद प्रसिद्ध है, आइए इसके बारे में जानते हैं।
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नीलकंठ महादेव मंदिर - फोटो : adobe stock
Rishikesh Neelkanth Mahadev Temple: सावन का पवित्र महीना भगवान शिव की समर्पित होता है। पूरे भारत में शिवालयों में विशेष पूजा-अर्चना की जाती है, लेकिन हिमालय की तलहटी में स्थित नीलकंठ महादेव मंदिर का महत्व कुछ अलग ही है। यह मंदिर उत्तराखंड के पौड़ी गढ़वाल जिले में, ऋषिकेश से लगभग 32 किलोमीटर दूर मणिकूट पर्वत पर स्थित है। सावन के अवसर पर हर साल लाखों की संख्या में शिवभक्त यहां दर्शन और जलाभिषेक के लिए पहुंचते हैं।

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पौराणिक कथा से जुड़ा है मंदिर का इतिहास
नीलकंठ महादेव मंदिर से जुड़ी पौराणिक कथा बेहद प्रसिद्ध है। मान्यता के अनुसार जब समुद्र मंथन हुआ था, तब अमृत के साथ-साथ एक घातक विष "हलाहल" भी बाहर आया था। यह विष इतना जहरीला था कि इससे संपूर्ण सृष्टि के विनाश हो सकता था। देवताओं और असुरों में से कोई भी इसे ग्रहण करने को तैयार नहीं था। तब संपूर्ण ब्रह्मांड की रक्षा के लिए भगवान शिव ने वह विष स्वयं पिया।
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पौराणिक कथा से जुड़ा है मंदिर का इतिहास - फोटो : adobe
कहा जाता हैं कि जैसे ही शिव ने हलाहल को ग्रहण किया, माता पार्वती ने उनका कंठ पकड़ लिया, जिससे विष ना तो उनके भीतर गया और ना ही बाहर आया। विष उनके कंठ में अटक गया, जिससे उनका गला नीला पड़ गया। तभी से उनका नाम “नीलकंठ” पड़ा। जिस स्थान पर यह घटना घटी थी, आज नीलकंठ महादेव मंदिर के रूप में पूजा जाता है।
 

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समाधि में लीन हुए थे भगवान शिव - फोटो : freepik
समाधि में लीन हुए थे भगवान शिव
पौराणिक मान्यता यह भी बताती है कि विष की तीव्रता और गर्मी के कारण भगवान शिव शीतलता की खोज में हिमालय की ओर बढ़े और मणिकूट पर्वत पर मधुमती और पंकजा नदियों के संगम स्थल पर एक वृक्ष के नीचे बैठकर ध्यानमग्न हो गए। वर्षों तक वे समाधि में लीन रहे। माता पार्वती ने भी वहीं बैठकर उनके ध्यान से बाहर आने का इंतजार किया। जब शिव ने समाधि समाप्त की, तो इस स्थान को “नीलकंठ धाम” नाम दिया गया।

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सावन में होती है लाखों कांवड़ियों की भीड़ - फोटो : adobe stock
सावन में होती है लाखों कांवड़ियों की भीड़
श्रावण मास में इस मंदिर का धार्मिक महत्व और भी बढ़ जाता है। देशभर से लाखों कांवड़िए गंगाजल लेकर यहां पहुंचते हैं और भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं। मान्यता है कि सावन के सोमवार को इस मंदिर में दर्शन करने से विशेष पुण्य की प्राप्ति होती है और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है। 

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सावन में होती है लाखों कांवड़ियों की भीड़ - फोटो : adobe
नीलकंठ महादेव मंदिर न केवल धार्मिक आस्था का केंद्र है, बल्कि यह ऋषिकेश आने वाले पर्यटकों के लिए भी एक लोकप्रिय जगह है। कठिन पहाड़ी रास्तों और हरे-भरे जंगलों से होते हुए इस मंदिर तक पहुंचना स्वयं एक रोमांचक अनुभव होता है।


 
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं, ज्योतिष, पंचांग, धार्मिक ग्रंथों आदि पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।
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