पितृपक्ष में श्राद्ध और तर्पण की सरल विधि
- फोटो : Amar Ujala
पितृपक्ष में श्राद्ध और तर्पण की सरल विधि
- परंपरा के अनुसार तर्पण के लिए दिन के समय को उपयुक्त माना जाता है। जल में काले तिल, जौ, दूध और गंगाजल मिलाकर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके पितरों का स्मरण करते हुए तर्पण किया जाता है। तर्पण का सटीक समय स्थानीय पंचांग और तिथि के अनुसार अलग हो सकता है।
- श्राद्ध कर्म में कुशा का विशेष महत्व माना गया है। कुशा धारण करने के बाद श्रद्धापूर्वक पितरों का स्मरण किया जाता है और 'ॐ पितृभ्यो नमः' मंत्र का जाप किया जा सकता है।
- श्राद्ध के लिए सात्विक भोजन तैयार करने के बाद उसका एक हिस्सा पंचबली के लिए निकाला जाता है। धार्मिक परंपरा के अनुसार इसमें गाय, कुत्ते, कौए, देव और चींटियों के लिए भोजन अर्पित किया जाता है।
- पंचबली के बाद ब्राह्मणों को श्रद्धापूर्वक भोजन कराने और सामर्थ्य के अनुसार दान-दक्षिणा देने की परंपरा है। इसके बाद पितरों का स्मरण कर उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त की जाती है।
- पितृपक्ष का मूल भाव अपने पूर्वजों को याद करना, उनके प्रति सम्मान व्यक्त करना और परिवार की परंपराओं के अनुसार धार्मिक कर्म करना है। श्राद्ध की तिथि और विधि अलग-अलग परंपराओं तथा स्थानीय पंचांग के अनुसार बदल सकती है। इसलिए किसी विशेष श्राद्ध के लिए स्थानीय पंचांग या विद्वान पुरोहित से तिथि और विधि की पुष्टि करना उचित माना जाता है
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं, ज्योतिष, पंचांग, धार्मिक ग्रंथों आदि पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।