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पितृपक्ष 2026 में कौन-कौन से श्राद्ध किए जाते हैं? जानें सही पूजा विधि और मान्यता

Thu, 01 Oct 2026 01:27 AM IST
श्वेता सिंह धर्म डेस्क, अमर उजाला

सार

पितृपक्ष हिंदू धर्म में पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता प्रकट करने का विशेष समय माना जाता है। इस दौरान पितरों के निमित्त श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान जैसे धार्मिक कर्म किए जाते हैं। जानिए पितृपक्ष 2026 में कौन-कौन से श्राद्ध होते हैं और उनकी पूजा-विधि व धार्मिक महत्व क्या है।
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श्राद्ध के प्रकार - फोटो : amar ujala

हिंदू पंचांग में भाद्रपद पूर्णिमा से लेकर आश्विन अमावस्या तक का समय पूर्वजों के स्मरण और उनके निमित्त धार्मिक कर्म करने के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है। साल 2026 में पितृपक्ष की शुरुआत 26 सितंबर, शनिवार से होगी और इसका समापन 10 अक्टूबर को होगा। पितृपक्ष के दौरान लोग अपने दिवंगत पूर्वजों को श्रद्धापूर्वक याद करते हैं और उनकी आत्मिक शांति के लिए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान जैसे कर्म करते हैं। सनातन परंपरा में अलग-अलग तिथियों और परिस्थितियों के अनुसार श्राद्ध के अलग-अलग प्रकार बताए गए हैं। ऐसे में यह जानना जरूरी हो जाता है कि किस स्थिति में कौन-सा श्राद्ध किया जाता है।

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श्राद्ध के प्रकार - फोटो : freepik
  • एकोद्दिष्ट श्राद्ध: हाल ही में जिन परिजनों का निधन हुआ हो, उनके निमित्त एकोद्दिष्ट श्राद्ध किए जाने की परंपरा बताई गई है। इसमें विशेष रूप से एक ही दिवंगत व्यक्ति को ध्यान में रखकर श्राद्ध कर्म किया जाता है।
  • अविधवा नवमी: ऐसी विवाहित महिलाओं के लिए अविधवा नवमी का श्राद्ध किया जाता है, जिनका निधन उनके पति के जीवित रहते हुआ हो। इस दिन उनके सम्मान और स्मरण के लिए धार्मिक कर्म किए जाते हैं।
  • नाना-नानी श्राद्ध: मातृ पक्ष के दिवंगत नाना-नानी एवं अन्य पूर्वजों के निमित्त भी श्राद्ध करने की परंपरा है। इसके लिए प्रतिपदा या दशमी तिथि का उल्लेख धार्मिक परंपराओं में मिलता है।
  • चतुर्दशी श्राद्ध: अकाल मृत्यु, दुर्घटना या किसी विशेष असामान्य परिस्थिति में मृत्यु होने पर चतुर्दशी तिथि को श्राद्ध करने का विधान माना जाता है। इसे विशेष परिस्थितियों में किए जाने वाले श्राद्ध के रूप में देखा जाता है।
  • सर्वपितृ अमावस्या: पितृपक्ष के अंतिम दिन सर्वपितृ अमावस्या आती है। जिन पूर्वजों की मृत्यु की तिथि ज्ञात नहीं होती या जिनका किसी कारण से निर्धारित तिथि पर श्राद्ध नहीं हो पाया हो, उनके लिए इस दिन श्राद्ध और तर्पण किया जाता है। इसलिए पितृपक्ष में इस अमावस्या का विशेष महत्व माना जाता है।
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पितृपक्ष में श्राद्ध करने का क्या महत्व है - फोटो : Amar Ujala

पितृपक्ष में श्राद्ध करने का क्या महत्व है?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार पितृपक्ष में श्रद्धापूर्वक श्राद्ध और तर्पण करने से पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त होती है और उनका आशीर्वाद प्राप्त होने की कामना की जाती है। मान्यता है कि पितरों के प्रसन्न होने से परिवार में सुख-शांति और समृद्धि बनी रहती है। श्राद्ध कर्म के दौरान पंचबली निकालने की भी परंपरा है। इसमें गाय, कुत्ते, कौए, देवताओं और चींटियों के लिए भोजन का अंश निकाला जाता है। इसके अलावा ब्राह्मणों को सात्विक भोजन कराने और अपनी क्षमता के अनुसार दान-दक्षिणा देने की परंपरा भी बताई गई है। धार्मिक मान्यताओं में इन कर्मों को पितरों की तृप्ति और परिवार के कल्याण से जोड़कर देखा जाता है। हालांकि, इनसे जुड़े फल धार्मिक आस्था और परंपरा पर आधारित हैं।

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पितृपक्ष में श्राद्ध और तर्पण की सरल विधि - फोटो : Amar Ujala

पितृपक्ष में श्राद्ध और तर्पण की सरल विधि

  • परंपरा के अनुसार तर्पण के लिए दिन के समय को उपयुक्त माना जाता है। जल में काले तिल, जौ, दूध और गंगाजल मिलाकर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके पितरों का स्मरण करते हुए तर्पण किया जाता है। तर्पण का सटीक समय स्थानीय पंचांग और तिथि के अनुसार अलग हो सकता है।
  • श्राद्ध कर्म में कुशा का विशेष महत्व माना गया है। कुशा धारण करने के बाद श्रद्धापूर्वक पितरों का स्मरण किया जाता है और 'ॐ पितृभ्यो नमः' मंत्र का जाप किया जा सकता है।
  • श्राद्ध के लिए सात्विक भोजन तैयार करने के बाद उसका एक हिस्सा पंचबली के लिए निकाला जाता है। धार्मिक परंपरा के अनुसार इसमें गाय, कुत्ते, कौए, देव और चींटियों के लिए भोजन अर्पित किया जाता है।
  • पंचबली के बाद ब्राह्मणों को श्रद्धापूर्वक भोजन कराने और सामर्थ्य के अनुसार दान-दक्षिणा देने की परंपरा है। इसके बाद पितरों का स्मरण कर उनके प्रति श्रद्धा व्यक्त की जाती है।
  • पितृपक्ष का मूल भाव अपने पूर्वजों को याद करना, उनके प्रति सम्मान व्यक्त करना और परिवार की परंपराओं के अनुसार धार्मिक कर्म करना है। श्राद्ध की तिथि और विधि अलग-अलग परंपराओं तथा स्थानीय पंचांग के अनुसार बदल सकती है। इसलिए किसी विशेष श्राद्ध के लिए स्थानीय पंचांग या विद्वान पुरोहित से तिथि और विधि की पुष्टि करना उचित माना जाता है
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं, ज्योतिष, पंचांग, धार्मिक ग्रंथों आदि पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।
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