कुछ लोग मंदिरों में मन्नत पूरी होने पर प्रसाद, सोना या चांदी चढ़ाने को 'रिश्वत' या सौदेबाजी मानते हैं। हालांकि, हिंदू धर्म, संस्कृति और मनोविज्ञान के अनुसार यह रिश्वत बिल्कुल नहीं है, बल्कि यह ईश्वर के प्रति मनुष्य की श्रद्धा, कृतज्ञता और समर्पण का प्रतीक है। इसे विस्तार से निम्नलिखित श्रेणियों के माध्यम से समझा जा सकता है।
1. 'रिश्वत' और 'दान/प्रसाद' में बुनियादी अंतर
- रिश्वत: यह किसी व्यक्ति से अनुचित काम कराने या स्वार्थ पूर्ति के लिए दिया जाने वाला प्रलोभन है, जिसमें सौदेबाजी की भावना होती है।
- प्रसाद और दान: ईश्वर संपूर्ण सृष्टि के स्वामी हैं, उन्हें किसी भौतिक वस्तु की आवश्यकता नहीं होती। मन्नत पूरी होने पर हम जो अर्पित करते हैं, वह सौदेबाजी नहीं बल्कि केवल धन्यवाद (कृतज्ञता) व्यक्त करने का एक भाविक माध्यम है।