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इस मंदिर के गुम्बद के आसपास कभी नहीं उड़ता कोई पक्षी, जानिए और इस ऐसे कई राज

Sat, 16 Dec 2017 08:51 AM IST
निर्मल मोहन
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जगन्नाथ अर्थात जगत का स्वामी। जहां खुद जगन्नाथ विराजे हों, उनकी नगरी जगन्नाथपुरी ही कहलाएगी। पुरी ओडिशा में स्थित जगन्‍नाथ मंदिर भगवान श्री कृष्‍ण के स्वरूप को समर्पित है। मंदिर जितना विशाल है, उतना ही आधुनिक विज्ञान की समझ से परे है। मंदिर के शिखर पर लहराती लाल ध्वजा हमेशा हवा के विपरीत दिशा में लहराती है।
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हर दिन शाम की आरती के बाद ध्वज को बदला जाता है। बदलने के लिए जो व्यक्ति स्तंभ पर चढ़ता है वह उल्टा चढ़ता और उतरता है। उस दौरान भी ध्वज लहराता रहता है और लोग विस्मय विमुग्ध होकर भगवान को याद करते हैं।
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यह विश्व का सबसे बड़ा, भव्य और ऊंचा मंदिर है। चार लाख वर्गफुट में फैला और करीब 214 फुट ऊंचे मंदिर का  शिखर आसानी से नहीं देखा जा सकता। मुख्य गुंबद की छाया प्राय: दिखाई नहीं देती है। किसी भी जगह से देखें मंदिर के शीर्ष पर लगा सुदर्शन चक्र, जिसे नीलचक्र भी कहते हैं, सामने ही लगा दिखाई देता है। यह अष्ट धातुओं से बना है और देवप्रतिमा की तरह ही पवित्र माना जाता है। मंदिर के गुंबद के आसपास कभी कोई पक्षी उड़ता नहीं देखा गया। पक्षी शिखर के पास भी उड़ते नजर नहीं आते।

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सिंह द्वार से मंदिर परिसर में प्रवेश करने पर सागर की लहरों की आवाज नहीं सुनाई देती। जबकि बाहर निकलते ही समुद्र की लहरें जोर से सुनाई देती है। मंदिर की रसोई में प्रसाद तैयार करने के लिए सात बर्तन एक-दूसरे पर रखे जाते हैं और सब कुछ लकड़ियों पर ही पकाया जाता है। इस प्रक्रिया में शीर्ष बर्तन में सामग्री पहले पकती है फिर नीचे की तरफ एक के बाद एक पकती जाती है। यानी सबसे ऊपर रखे बर्तन का खाना पहले पक जाता है। 
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पांच सौ रसोइए प्रसाद बनाते हैं। इतना कि उत्सव के दिनों में बीस लाख व्यक्ति तक भोजन कर सकें। कहते हैं कि प्रसाद कुछ हजार लोगों के लिए बनाया गया हो, तो भी लाखों लोगों के लिए कम नहीं पड़ता, न ही व्यर्थ जाता है। यहां जगन्नाथ जी के साथ के मंदिरों में भाई बलराम और बहन सुभद्रा भी हैं। तीनों की मूर्तियां काष्ठ की बनी हुई हैं। बारहवें वर्ष में एक बार प्रतिमा नई जरूर बनाई जाती हैं, लेकिन इनका आकार और रूप वही रहता है। कहा जाता है कि मूर्तियों की पूजा नहीं होती, केवल दर्शनार्थ रखी गई हैं।  
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