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Kanwar Yatra 2026: आखिर कौन था पहला कांवड़िया, जिसने शुरू की शिव को जल चढ़ाने की परंपरा?

Thu, 16 Jul 2026 12:06 AM IST
श्वेता सिंह धर्म डेस्क, अमर उजाला

सार

Kanwar Yatra Significance: कांवड़ यात्रा की शुरुआत को लेकर भगवान परशुराम, श्रवण कुमार और रावण से जुड़ी कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं। इनमें से भगवान परशुराम को प्रथम कांवड़िया मानने की मान्यता सबसे अधिक लोकप्रिय है। 
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कांवड़ यात्रा - फोटो : amar ujala

Kanwar Yatra 2026: कांवड़ यात्रा हिंदू धर्म की सबसे महत्वपूर्ण धार्मिक यात्राओं में से एक मानी जाती है। यह केवल पैदल चलकर गंगाजल लाने की परंपरा नहीं, बल्कि भगवान शिव के प्रति अटूट आस्था, तप, संयम और समर्पण का प्रतीक है। हर वर्ष सावन मास में लाखों शिवभक्त पवित्र नदियों, विशेष रूप से गंगा से जल भरकर कांवड़ में लेकर अपने आराध्य भगवान शिव का जलाभिषेक करते हैं। धार्मिक मान्यता है कि श्रद्धा और नियमपूर्वक की गई यह यात्रा भगवान शिव की विशेष कृपा दिलाती है तथा मनोकामनाओं की पूर्ति का माध्यम बनती है। कई श्रद्धालु परिवार की सुख-समृद्धि, स्वास्थ्य, संतान प्राप्ति, करियर में सफलता या अन्य इच्छाओं की पूर्ति के लिए कांवड़ यात्रा का संकल्प लेते हैं। यात्रा पूरे सावन महीने में चलती है, लेकिन अधिकांश श्रद्धालु श्रावण शिवरात्रि के दिन शिवलिंग पर गंगाजल अर्पित कर अपनी यात्रा पूर्ण करते हैं, क्योंकि इस दिन जलाभिषेक का विशेष महत्व माना जाता है।

 

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कांवड़ यात्रा 2026 कब से कब तक रहेगी?
वर्ष 2026 में कांवड़ यात्रा 30 जुलाई से 28 अगस्त तक चलेगी। हालांकि, मुख्य कांवड़ यात्रा 11 अगस्त 2026 तक ही मानी जाएगी, क्योंकि इसी दिन सावन शिवरात्रि का पर्व मनाया जाएगा। परंपरा के अनुसार अधिकतर कांवड़िए इसी दिन भगवान शिव का जलाभिषेक कर अपनी यात्रा का समापन करते हैं।

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कांवड़ जल चढ़ाने का शुभ समय - फोटो : adobe

कांवड़ जल चढ़ाने का शुभ समय
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सावन महीने में किसी भी दिन श्रद्धापूर्वक भगवान शिव को गंगाजल अर्पित किया जा सकता है। फिर भी कुछ तिथियों को विशेष रूप से अधिक शुभ माना जाता है।

  • सावन के सभी सोमवार
  • नाग पंचमी
  • सावन शिवरात्रि

इन दिनों में किया गया जलाभिषेक अत्यंत फलदायी माना जाता है। वर्ष 2026 में सावन शिवरात्रि 11 अगस्त को होगी और इस दिन श्रद्धालु पूरे दिन अपनी सुविधा और परंपरा के अनुसार जलाभिषेक कर सकेंगे।

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भगवान परशुराम को माना जाता है प्रथम कांवड़िया - फोटो : adobe stock

कौन था पहला कांवड़िया?
कांवड़ यात्रा की शुरुआत को लेकर अलग-अलग पौराणिक और लोक कथाएं प्रचलित हैं। विभिन्न ग्रंथों और परंपराओं में अलग-अलग प्रसंग मिलते हैं। इसलिए किसी एक कथा को सर्वमान्य ऐतिहासिक तथ्य नहीं माना जाता, बल्कि इन्हें धार्मिक मान्यताओं के रूप में देखा जाता है।
भगवान परशुराम को माना जाता है प्रथम कांवड़िया
सबसे प्रचलित मान्यता के अनुसार भगवान परशुराम को संसार का पहला कांवड़िया माना जाता है। कहा जाता है कि त्रेतायुग में उन्होंने गढ़मुक्तेश्वर से पवित्र गंगाजल लाकर उत्तर प्रदेश के पुरा महादेव मंदिर में भगवान शिव का जलाभिषेक किया था। माना जाता है कि यहीं से कांवड़ में जल लाकर शिव को अर्पित करने की परंपरा का आरंभ हुआ। आज भी इस स्थान का कांवड़ यात्रा से विशेष संबंध माना जाता है।

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श्रवण कुमार की कथा - फोटो : अमर उजाला

श्रवण कुमार की कथा
एक अन्य प्रसिद्ध लोककथा श्रवण कुमार से जुड़ी है। कहा जाता है कि वे अपने वृद्ध और नेत्रहीन माता-पिता को कंधों पर कांवड़ जैसी संरचना में बैठाकर तीर्थयात्रा पर ले गए थे। यात्रा के दौरान वे पवित्र जल भी साथ लेकर चलते थे। हालांकि यह कथा माता-पिता की सेवा का प्रतीक अधिक मानी जाती है, फिर भी कई लोग इसे कांवड़ परंपरा की प्रेरणा के रूप में देखते हैं।

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रावण से जुड़ी मान्यता - फोटो : Adobe Stock

रावण से जुड़ी मान्यता
कुछ धार्मिक मान्यताओं में लंकापति रावण का भी उल्लेख मिलता है। कथा के अनुसार समुद्र मंथन के समय निकले हलाहल विष को भगवान शिव ने ग्रहण किया था, जिससे उनके शरीर में अत्यधिक ताप उत्पन्न हो गया। तब रावण ने कांवड़ में गंगाजल भरकर भगवान शिव का अभिषेक किया, जिससे उन्हें शीतलता मिली। इस प्रसंग को भी कांवड़ यात्रा की शुरुआत से जोड़कर देखा जाता है।

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कांवड़ यात्रा का धार्मिक महत्व

कांवड़ यात्रा का धार्मिक महत्व
कांवड़ यात्रा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि आत्मसंयम, अनुशासन और भक्ति का अभ्यास भी है। यात्रा के दौरान श्रद्धालु सात्विक जीवन अपनाते हैं, नियमों का पालन करते हैं और भगवान शिव का निरंतर स्मरण करते हैं। कई भक्त नंगे पैर यात्रा करते हैं, जबकि कुछ विशेष संकल्प लेकर पूरी यात्रा मौन या अन्य धार्मिक नियमों के साथ पूरी करते हैं। धार्मिक मान्यता है कि श्रद्धा, नियम और पवित्र भाव से भगवान शिव का जलाभिषेक करने से जीवन की बाधाएं दूर होती हैं, मानसिक शांति मिलती है और भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है।

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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं, ज्योतिष, पंचांग, धार्मिक ग्रंथों आदि पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।  

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