कामदा एकादशी व्रत कथा
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कामदा एकादशी व्रत कथा
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, ऐसा कहा जाता है कि महर्षि वशिष्ठ ने भगवान राम के पूर्वज राजा दिलीप को कामदा एकादशी की कथा सुनाई थी। कथा इस प्रकार है-
प्राचीन काल में भोगिपुर नामक नगर में पुंडरीक नाम का एक राजा राज करते थे। उसी नगर में ललिता और ललित नाम के पति-पत्नी रहते थे। उन दोनों के बीच असीम प्रेम और निष्ठा थी। ललित राजा के महल में संगीतकार के रूप में कार्य करता था। एक दिन जब ललित राजदरबार में गंधर्वों के साथ संगीत प्रस्तुत कर रहा था तो उसका मन अपनी पत्नी ललिता की ओर चला गया। इस कारण उसके गायन में त्रुटि हो गई। इसे अपना अपमान मानते हुए राजा पुण्डरीक क्रोधित हो गए। उन्होंने ललित को राक्षस बनने का श्राप दे दिया।
उस श्राप के परिणामस्वरूप, ललित ने एक भयानक रूप धारण कर लिया और वह नरभक्षी बन गया। उसका चेहरा भी किसी राक्षस की तरह ही अत्यंत कुरूप हो गया। इसके बावजूद, ललिता ने अपने पति का साथ नहीं छोड़ा। वह उसे बचाने का उपाय खोजने लगी। एक दिन जब ललित जंगल की ओर गया तो ललिता भी उसके पीछे-पीछे चली गई। वहां उसने एक सुंदर आश्रम देखा। उसने आश्रम में रहने वाले ऋषियों को प्रणाम किया और अपनी व्यथा सुनाई। ऋषियों ने करुणावश उसे बताया कि यदि वह चैत्र मास की एकादशी के दिन व्रत रखे और उस व्रत का पुण्य अपने पति को अर्पित कर दे तो वह श्राप से मुक्त हो जाएगा।
ऋषियों की सलाह का पालन करते हुए ललिता ने पूरी श्रद्धा के साथ कामदा एकादशी का व्रत रखा। उसने द्वादशी के दिन व्रत का पारण किया और उसका पुण्य अपने पति को अर्पित कर दिया। उस व्रत के प्रभाव से ललित धीरे-धीरे अपने मूल रूप में वापस आ गया। इसके पश्चात् उस जोड़े ने निरंतर एकादशी का व्रत रखा और सुख-शांतिपूर्ण जीवन व्यतीत किया। यह कथा कामदा एकादशी के महत्व को भक्तिभाव से रखने से समस्त पापों का नाश होता है और जीवन में सुख-समृद्धि का आगमन होता है।
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