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Kamada Ekadashi Vrat Katha: पत्नी की निष्ठा से मिला पति को श्राप से छुटकारा, यहां पढ़ें कामदा एकादशी व्रत कथा

Sun, 29 Mar 2026 12:31 AM IST
Shweta Singh धर्म डेस्क, अमर उजाला

सार

Kamada Ekadashi Vrat Katha: कामदा एकादशी का व्रत 29 मार्च को रखा जाएगा। जो लोग यह व्रत रखते हैं, उनके लिए केवल उपवास करना ही नहीं, बल्कि श्रद्धापूर्वक व्रत कथा को सुनना या पढ़ना भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। शास्त्रों में कहा गया है कि ऐसा करने से ही व्रत का पूर्ण फल प्राप्त होता है।
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कामदा एकादशी व्रत कथा - फोटो : amar ujala
Kamada Ekadashi Katha: कामदा एकादशी व्रत चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को रखा जाता है। ऐसी मान्यता है कि यदि इस दिन भगवान विष्णु की श्रद्धापूर्वक पूजा की जाए  तो शुभ फलों की प्राप्ति होती है और व्यक्ति को अपने पापों से मुक्ति मिल जाती है। कामदा एकादशी का व्रत 29 मार्च को रखा जाएगा। जो लोग यह व्रत रखते हैं, उनके लिए केवल उपवास करना ही नहीं, बल्कि श्रद्धापूर्वक व्रत कथा को सुनना या पढ़ना भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। शास्त्रों में कहा गया है कि ऐसा करने से ही व्रत का पूर्ण फल प्राप्त होता है। आइए यहां पढ़ते हैं कामदा एकादशी व्रत कथा।
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कामदा एकादशी व्रत कथा - फोटो : Adobe stock
कामदा एकादशी व्रत कथा
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, ऐसा कहा जाता है कि महर्षि वशिष्ठ ने भगवान राम के पूर्वज राजा दिलीप को कामदा एकादशी की कथा सुनाई थी। कथा इस प्रकार है-

प्राचीन काल में भोगिपुर नामक नगर में पुंडरीक नाम का एक राजा राज करते थे। उसी नगर में ललिता और ललित नाम के पति-पत्नी रहते थे। उन दोनों के बीच असीम प्रेम और निष्ठा थी। ललित राजा के महल में संगीतकार के रूप में कार्य करता था। एक दिन जब ललित राजदरबार में गंधर्वों के साथ संगीत प्रस्तुत कर रहा था तो उसका मन अपनी पत्नी ललिता की ओर चला गया। इस कारण उसके गायन में त्रुटि हो गई। इसे अपना अपमान मानते हुए राजा पुण्डरीक क्रोधित हो गए। उन्होंने ललित को राक्षस बनने का श्राप दे दिया।

उस श्राप के परिणामस्वरूप, ललित ने एक भयानक रूप धारण कर लिया और वह नरभक्षी बन गया। उसका चेहरा भी किसी राक्षस की तरह ही अत्यंत कुरूप हो गया। इसके बावजूद, ललिता ने अपने पति का साथ नहीं छोड़ा। वह उसे बचाने का उपाय खोजने लगी। एक दिन जब ललित जंगल की ओर गया तो ललिता भी उसके पीछे-पीछे चली गई। वहां  उसने एक सुंदर आश्रम देखा। उसने आश्रम में रहने वाले ऋषियों को प्रणाम किया और अपनी व्यथा सुनाई। ऋषियों ने करुणावश उसे बताया कि यदि वह चैत्र मास की एकादशी के दिन व्रत रखे और उस व्रत का पुण्य अपने पति को अर्पित कर दे तो वह श्राप से मुक्त हो जाएगा।

ऋषियों की सलाह का पालन करते हुए ललिता ने पूरी श्रद्धा के साथ कामदा एकादशी का व्रत रखा। उसने द्वादशी के दिन व्रत का पारण किया और उसका पुण्य अपने पति को अर्पित कर दिया। उस व्रत के प्रभाव से ललित धीरे-धीरे अपने मूल रूप में वापस आ गया। इसके पश्चात् उस जोड़े ने निरंतर एकादशी का व्रत रखा और सुख-शांतिपूर्ण जीवन व्यतीत किया। यह कथा कामदा एकादशी के महत्व को भक्तिभाव से रखने से समस्त पापों का नाश होता है और जीवन में सुख-समृद्धि का आगमन होता है।



डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं, ज्योतिष, पंचांग, धार्मिक ग्रंथों आदि पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। 
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