राधा कृष्ण
वृंदावन में भगवान के साथी थे बांसुरी और मोरपंख
वृंदावन में 11 वर्ष 56 दिन के प्रवास के दौरान भगवान कृष्ण ने कभी सिले वस्त्र नहीं पहने,कभी पैरों में पनही नहीं पहनी। लेकिन माथे पर मोर मुकुट और हाथों से बांसुरी को कभी अलग नहीं किया। भागवताचार्यों का मत है कि बांसुरी जहां प्रेम का प्रतीक है,वहीं मोर मुकुट काम त्याग का परिचायक है। इस प्रसंग की व्याख्या अलग अलग विद्वानों ने अपने अपने तरीके से किया है,लेकिन इन सभी विद्वानों में कोई दो राय नहीं है कि दो शरीर में धरती पर अवतरित हुए भगवान कृष्ण और राधा रानी एक ही हैं, केवल लीला के लिए दो शरीर में अवतरित हुए हैं। यह बांसुरी ही तो थी जो इन दो शरीरों के तार को आपस में जोड़ने का काम करती थी। कई विद्वानों ने यहां तक माना है कि यह बांसुरी भी गोलोक धाम से ही आई थी।