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Jagannath Rath Yatra: 27 जून से शुरू होगी जगन्नाथ रथ यात्रा, जानिए कब और कैसे शुरू होगा एकांतवास

Wed, 11 Jun 2025 12:50 PM IST
श्वेता सिंह धर्म डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

Jagannatha Rath Yatra Imporance: भगवान जगन्नाथ अपने भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा के साथ रथ यात्रा पर निकलने से पहले 14 दिनों का एकांतवास रखते हैं। इसके बाद शुक्ल पक्ष की द्वितीय तिथि को वे दर्शन देते हैं।
 
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जगन्नाथ रथयात्रा का महत्व - फोटो : adobe stock
Significance of Jagannatha Rath Yatra: पुरी की जगन्नाथ यात्रा भारत की सबसे पवित्र धार्मिक यात्राओं में से एक है, जो हर साल आषाढ़ महीने के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि से शुरू होकर दशमी तिथि तक चलती है। इस बार यह यात्रा 27 जून से शुरू होकर 5 जुलाई को समाप्त होगी। लोगों का मानना है कि इस यात्रा में शामिल होना और भगवान जगन्नाथ के दर्शन करने से जीवन के सभी दुख और परेशानियां दूर हो जाती हैं और मृत्यु के बाद मोक्ष की प्राप्ति होती है।
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भगवान जगन्नाथ अपनी इस यात्रा पर निकलने से पहले अपने भाई बालभद्र और बहन सुभद्रा के साथ 14 दिनों का एकांतवास करते हैं। इसके बाद शुक्ल पक्ष की द्वितीय तिथि को वे भक्तों को दर्शन देते हैं और रथ यात्रा की शुरुआत होती है। यह परंपरा भक्तों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है, जो आध्यात्मिक शांति और सुख-समृद्धि का संदेश देती है।
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जगन्नाथ रथयात्रा का महत्व - फोटो : adobe stock
भगवान जगन्नाथ रथ यात्रा कब शुरू?
भगवान जगन्नाथ रथ यात्रा इस साल ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन यानी 11 जून को शुरू होगी। इसके पहले भगवान का सहस्त्रधारा स्नान किया जाएगा, जिसमें 108 घड़ों पानी से उनका स्नान कराया जाता है। यह स्नान यात्रा से पहले किया जाने वाला एक खास धार्मिक अनुष्ठान होता है। इसके बाद भगवान अपने भाई बहनों के साथ एकांतवास पर चले जाएंगे। यह एक महत्वपूर्ण परंपरा है जो रथ यात्रा से जुड़ी हुई है।
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जगन्नाथ रथयात्रा का महत्व - फोटो : adobe stock
पौराणिक कथा
जगन्नाथ रथ यात्रा के पीछे एक पौराणिक कथा है, जो पद्म पुराण में वर्णित है। कहा जाता है कि आषाढ़ महीने में भगवान जगन्नाथ की बहन सुभद्रा ने उनसे बाहर जाकर शहर देखने की इच्छा जताई थी। तब भगवान जगन्नाथ ने अपने भाई बलराम और बहन सुभद्रा के लिए तीन रथ बनवाए। तीनों भाई-बहन उन रथों पर बैठकर नगर भ्रमण पर निकले और अपनी मौसी के घर, जिसे गुंडिचा मंदिर कहा जाता है, वहां सात दिन तक रहे। इस घटना के बाद से ही हर साल यह रथ यात्रा निकाली जाने लगी। इस रथ यात्रा में सबसे आगे भगवान बलराम का रथ होता है, बीच में बहन सुभद्रा का रथ और सबसे पीछे भगवान जगन्नाथ का रथ होता है।
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जगन्नाथ रथयात्रा का महत्व - फोटो : adobe stock
जगन्नाथ रथ यात्रा से जुड़ी मान्यताएं
  • जगन्नाथ रथ यात्रा भारत की सबसे प्राचीन और प्रसिद्ध धार्मिक परंपराओं में से एक है। माना जाता है कि इस यात्रा की शुरुआत 12वीं से 16वीं शताब्दी के बीच हुई थी, लेकिन इसकी उत्पत्ति को लेकर कई अलग-अलग कहानियां और मान्यताएं प्रचलित हैं।
  • एक मान्यता के अनुसार, यह रथ यात्रा भगवान कृष्ण की अपनी मां देवकी की जन्मभूमि की यात्रा का प्रतीक है। कहा जाता है कि भगवान कृष्ण ने अपनी मां के घर की याद में यह यात्रा आरंभ की थी, जो उनके जीवन से जुड़ी महत्वपूर्ण घटना को दर्शाती है।
  • दूसरी मान्यता के अनुसार, जगन्नाथ रथ यात्रा की शुरुआत राजा इंद्रद्युम्न ने की थी। राजा इंद्रद्युम्न को भगवान विष्णु के एक अवतार के रूप में माना जाता है और कहा जाता है कि उन्होंने इस यात्रा का आयोजन किया ताकि लोग भगवान जगन्नाथ की भव्य महिमा को देख सकें और उनकी भक्ति में शामिल हो सकें।
  • इसके अलावा, कुछ पुरातात्विक और ऐतिहासिक स्रोत बताते हैं कि यह यात्रा स्थानीय जनजातियों और ओडिशा के लोगों की सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराओं का हिस्सा थी, जिसे बाद में मंदिर और राजा-महाराजाओं ने आधिकारिक रूप दिया।
  • इस यात्रा के दौरान भगवान जगन्नाथ, उनके भाई बलराम और बहन सुभद्रा को बड़े भव्य और सजावट वाले रथों में बिठाकर पूरे शहर में निकाला जाता है। यह यात्रा केवल धार्मिक उत्सव नहीं, बल्कि समुदाय को जोड़ने, सामाजिक समरसता बढ़ाने और सांस्कृतिक विरासत को संजोने का भी माध्यम है।
  • यात्रा के दौरान भक्तजन भगवान की रथों को अपने हाथों से खींचते हैं, जिससे यह विश्वास जुड़ा है कि ऐसा करने से उनके सभी पाप धुल जाते हैं और उन्हें जीवन में सुख-शांति प्राप्त होती है। इसलिए यह यात्रा केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि लोगों के विश्वास, भक्ति और सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक भी है।
डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं, ज्योतिष, पंचांग, धार्मिक ग्रंथों आदि पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।
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