होलिकोत्सव सूर्य सिद्धां की गणना के अनुसार होने की वजह से वर्ष की समाप्ति का द्योतक है। इसी पूर्णिमा को श्रीविष्णु रूप भगवान नरसिंह का अवतरण हुआ था। मौसम की दृष्टि से इस त्योहार का बड़ा महत्व है। हेमंत ऋतु की समाप्ति तथा पतझड़ के बाद वसंत ऋतु का आगमन होता है। इस वसंत ऋतु में प्रकृति का मनोहारी रूप सामने आता है। बाग-बगीचे नए-नए फूलों की रंगत से भर जाते हैं। पशु-पक्षियों की चहचहाट गूंजने लगती है और आम की मंजरी/बौर फूटने लगती है। लगता है, मानो प्रकृति के पूरे प्रांगण में एक नई ऊर्जा उत्पन्न हुई है। इस त्योहार पर ध्यान दें, तो तीन चीजें प्रमुख हैं- रंग, ताप और वाणी। आयुर्वेद की दृष्टि से शरद ऋतु के कारण उत्पन्न कष्टों से निपटने के लिए ये तीनों ही अत्यंत जरूरी हैं।