हर्रम की दसवीं तारीख, यानी अशूरा, को हर साल ताजिए निकाले जाते हैं, जिन्हें बाद में दफनाया जाता है।
यौमे-ए-अशुरा कर्बला में क्यों मनाया जाता?
अशूरा का दिन सिर्फ एक तारीख नहीं, बल्कि सच और इंसाफ के लिए दी गई सबसे बड़ी कुर्बानी की याद है। इस दिन इमाम हुसैन और उनके वफादार साथियों ने यज़ीद के जुल्मों का सामना करते हुए शहादत प्राप्त की थी। वे झुके नहीं, बिके नहीं बल्कि सच्चाई के लिए आखिरी सांस तक डटे रहे। इराक की राजधानी बगदाद से करीब 100 किलोमीटर दूर एक छोटा सा कस्बा है कर्बला, जो आज भी उस दर्दनाक इतिहास की गवाही देता है। यही वो ज़मीन है जहां इमाम हुसैन और उनके साथियों को बेरहमी से शहीद किया गया। उसी कर्बला की याद में आज दुनिया के हर हिस्से में ‘कर्बला’ नाम की जगहें बनाई गई हैं मातम, ताजिए और शोक सभाएं इसी के प्रतीक हैं। मुहर्रम की दसवीं तारीख, यानी अशूरा, को हर साल ताजिए निकाले जाते हैं, जिन्हें बाद में दफनाया जाता है। यह सिर्फ एक रस्म नहीं, बल्कि उस पीड़ा और संघर्ष की अभिव्यक्ति है जो यज़ीद की सत्ता के खिलाफ खड़े होकर इमाम हुसैन ने झेली। आज भी, जब ये दिन आता है, पूरी दुनिया के मुसलमान गहरे शोक में डूब जाते हैं, और इमाम हुसैन की उस महान कुर्बानी को याद कर, अपने ईमान और इंसानियत को फिर से जाग्रत करते हैं।