वृंदा का श्राप और तुलसी का जन्म
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वृंदा का श्राप और तुलसी का जन्म
जब वृंदा को भगवान विष्णु के छल का पता चला, तो वह क्रोधित हो उठी। उसने दुखी होकर भगवान विष्णु को पत्थर (पाषाण) बनने का श्राप दे दिया और स्वयं आत्मदाह कर लिया। जहाँ वृंदा ने आत्मदाह किया, वहाँ तुलसी का पौधा उग आया। भगवान विष्णु ने शालिग्राम रूप धारण किया और वृंदा को वरदान दिया कि वह अब तुलसी के रूप में सदा उनके साथ रहेगी। भगवान विष्णु ने कहा, "हे वृंदा! तुम्हारा सतीत्व मुझे माता लक्ष्मी से भी अधिक प्रिय है। अब जो मनुष्य तुम्हारा विवाह मेरे शालिग्राम रूप के साथ करेगा, उसे इस लोक और परलोक में महान यश और धन मिलेगा।" तब से हर वर्ष तुलसी विवाह भगवान विष्णु के शालिग्राम रूप से आयोजित किया जाता है। इसे करने से घर में सुख, समृद्धि, स्वास्थ्य और धार्मिक पुण्य की प्राप्ति होती है।
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