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राजा जनक की ही नहीं, रावण की भी बेटी थीं माता सीता, अद्भुत रामायण में है उल्लेख

Tue, 24 Apr 2018 09:28 AM IST
धर्म डेस्क, अमर उजाला
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वैशाख महीने की शुक्ल पक्ष की नवमी को जानकी नवमी या सीता नवमी के रूप में मनाया जाता है। इस बार यह 24 अप्रैल को है। माता सीता के विषय में रामायण और अन्य ग्रंथों में जो उल्लेख मिलता है उसके अनुसार मिथिला के राजा जनक के राज्य में कई साल से बारिश नहीं हो रही थी। इससे चिंतित होकर जनक ने जब ऋषियों से विचार किया तब ऋषियों ने सलाह दिया कि महाराज स्वयं हल चलाएं तो इन्द्र देव की कृपा हो सकती है।


 
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मान्यता है कि बिहार स्थित सीतामढ़ी के पुनौरा गांव में राजा जनक ने हल चलाया था। हल चलाते समय हल की नोंक से एक धातु टकराकर अटक गया। राजा जनक ने उस स्थान की खुदाई करने का आदेश दिया। इस स्थान से एक कलश निकला जिसमें एक सुंदर सी कन्या थी। राजा जनक निःसंतान थे। तब कन्या को ईश्वर की कृपा मानकर पुत्री बना लिया। हल का फल जिसे सीत कहते हैं उससे टकराने के कारण कलश से कन्या बाहर आयी थी इसलिए कन्या का नाम सीता रखा गया।

 
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इस घटना से ज्ञात होता है कि सीता राजा जनक की अपनी पुत्री नहीं थी। धरती के अंदर छुपे कलश से प्राप्त होने के कारण सीता खुद को पृथ्वी की पुत्री मानती थी। लेकिन वास्तव में सीता के पिता कौन थे और कलश में सीता कैसे आयी इसका उल्लेख अलग-अलग भाषाओं में लिखे गये रामायण और कथाओं से प्राप्त होता है। अद्भुत रामायण में उल्लेख है कि जब रावण ब्रह्रााजी से कई वरदान मांगा रहा था तब उसने यह भी वरदान मांगा कि 'जब मैं भूलवश अपनी पुत्री से प्रणय की इच्छा करूं तब वही मेरी मृत्यु का कारण बने।' रावण के इस कथन से ज्ञात होता है कि सीता रावण की पुत्री थी। 

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अद्भुत रामायण में उल्लेख है कि, गृत्स्मद नामक ब्राह्मण माता लक्ष्मी को पुत्री रूप मे पाने की कामना से प्रतिदिन एक कलश मे कुश के अग्र भाग से मंत्रोच्चारण के साथ दूध की बूंदें डालता था। एक दिन जब ब्राह्मण कहीं बाहर गये थे तब रावण इनकी कुटिया में आया और यहां मौजूद ऋषियों को मारकर उनका रक्त कलश में भर लिया। यह कलश लाकर रावण ने मंदोदरी को सौंप दिया। रावण ने कहा कि यह तेज विष हैं इसे छुपाकर रख दो।
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मंदोदरी रावण की उपेक्षा से दुःखी थी। एक दिन जब रावण बाहर गया था तब मौका देखकर मंदोदरी ने कलश में रखा रक्त पी लिया। इसके पीने से मंदोदरी गर्भवती हो गयी। लोक लाज के डर से मंदोदरी अपनी पुत्री को कलश में रखकर उस स्थान पर छुपा गयी जहां से जनक ने उसे प्राप्त किया।
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