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Maa Durga Ke 9 Roop: मां दुर्गा के 9 स्वरूप और उनसे जुड़ी मान्यताएं, जानें नवरात्रि में उनकी पूजा का महत्व

Tue, 17 Mar 2026 04:55 PM IST
Jyoti Mehra धर्म डेस्क, अमर उजाला

सार

Maa Durga Ke 9 Roop: नवरात्रि के दिनों में श्रद्धालु पूरे भक्ति भाव के साथ मां के अलग-अलग रूपों की पूजा-अर्चना करते हैं और उनका आशीर्वाद प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। ऐसे में आइए विस्तार से जानते हैं मां दुर्गा के नौ स्वरूपों के बारे में...
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मां दुर्गा के नौ स्वरूप - फोटो : Amar Ujala
Navratri 9 Days Devi Names List: हिंदू धर्म में नवरात्रि का पर्व मां दुर्गा के नौ पवित्र स्वरूपों को समर्पित होता है। माना जाता है कि इस पावन समय में माता दुर्गा पृथ्वी पर आती हैं और अपने भक्तों पर कृपा बरसाती हैं। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जो भी व्यक्ति सच्ची श्रद्धा और नियम के साथ नवरात्रि का व्रत रखता है और मां दुर्गा की आराधना करता है, उसके जीवन के दुख और कष्ट धीरे-धीरे दूर होने लगते हैं। इन नौ दिनों के दौरान श्रद्धालु पूरे भक्ति भाव के साथ मां के अलग-अलग रूपों की पूजा-अर्चना करते हैं और उनका आशीर्वाद प्राप्त करने का प्रयास करते हैं। ऐसे में आइए जानते हैं मां दुर्गा के नौ स्वरूपों के बारे में विस्तार से...

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नवरात्रि मां शैलपुत्री   - फोटो : Amar Ujala
पहला दिन: मां शैलपुत्री
मां शैलपुत्री माता दुर्गा का पहला स्वरूप हैं, जिनकी पूजा नवरात्रि के पहले दिन की जाती है। वह पर्वतराज हिमालय की पुत्री मानी जाती हैं और देवी पार्वती के शुद्ध स्वरूप का प्रतीक हैं। मान्यता है कि जो भक्त सच्चे मन से उनकी पूजा करता है, उसे आध्यात्मिक शक्ति और आशीर्वाद प्राप्त होता है।

माता शैलपुत्री सफेद वस्त्र धारण करती हैं। उनके हाथ में त्रिशूल और कमल होता है और वह नंदी नामक बैल पर सवार रहती हैं।उनका प्रिय रंग नारंगी और प्रिय फूल गुड़हल माना जाता है। यह भी कहा जाता है कि वे पूरे ब्रह्मांड की सूक्ष्म ऊर्जा का प्रतीक हैं। उनका स्वरूप उस अवस्था को दर्शाता है, जब व्यक्ति अपने मन से भगवान के साथ आध्यात्मिक रूप से जुड़ाव महसूस करता है।
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नवरात्रि मां ब्रह्मचारिणी  - फोटो : Amar Ujala
दूसरा दिन: मां ब्रह्मचारिणी
ब्रह्मचारिणी को माता दुर्गा का दूसरा रूप माना जाता है, जिसकी पूजा नवरात्रि के दूसरे दिन की जाती है। यह देवी पार्वती का वह स्वरूप है, जब उनका विवाह भगवान शिव से नहीं हुआ था। इस रूप में उन्होंने भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए कई वर्षों तक कठोर तपस्या की थी। ब्रह्मचारिणी देवी सच्चे प्रेम, त्याग और समर्पण का प्रतीक मानी जाती हैं। भगवान शिव को पाने की उनकी इच्छा ने उन्हें हजारों वर्षों तक तप करने की शक्ति और दृढ़ता दी।

माता ब्रह्मचारिणी एक तपस्विनी कन्या के रूप में दिखाई देती हैं। वह नंगे पांव चलती हैं और उनके एक हाथ में जपमाला तथा दूसरे हाथ में कमंडल होता है। उनका सरल स्वरूप सादगी भरे जीवन, भक्ति, आत्मबल और ध्यान का प्रतीक है। उनका प्रिय रंग सफेद माना जाता है, जो शांति और पवित्रता का प्रतीक है। उनका प्रिय फूल गुलदाउदी है। वाराणसी के पंचगंगा घाट, घासी टोला में उनका एक प्रसिद्ध मंदिर भी स्थित है।

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नवरात्रि मां चंद्रघंटा - फोटो : Amar Ujala
तीसरा दिन: मां चंद्रघंटा
देवी माता दुर्गा का तीसरा स्वरूप मां चंद्रघंटा हैं। शिव महापुराण के अनुसार, उन्हें भगवान शिव की शक्ति माना जाता है। भगवान का कोई भी स्वरूप शक्ति के बिना अधूरा माना जाता है। उन्हें आंतरिक शक्ति, शांति और साहस की देवी माना जाता है।

माता चंद्रघंटा लाल वस्त्र धारण करती हैं और बाघ पर सवार रहती हैं। उनके हाथों में तलवार, त्रिशूल और धनुष जैसे अस्त्र होते हैं। इन अस्त्रों से वह बुराई का नाश करती हैं और धर्म की रक्षा करती हैं। माता चंद्रघंटा को रणचंडी के नाम से भी जाना जाता है। उनका तीसरा नेत्र हमेशा जागृत रहता है, जो इस बात का संकेत है कि वह दुष्ट शक्तियों से लड़ने के लिए सदैव तैयार रहती हैं। उनके प्रिय रंग सुनहरा और पीला माने जाते हैं, जो साहस और दया का प्रतीक हैं। उन्हें गेंदा और सूरजमुखी के फूल अर्पित किए जाते हैं।
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नवरात्रि मां कूष्मांडा - फोटो : Amar Ujala
चोथा दिन: मां कूष्मांडा
माता दुर्गा का चौथा दिव्य स्वरूप मां कूष्मांडा हैं। मान्यता है कि उन्होंने अपनी दिव्य मुस्कान से इस सृष्टि की रचना की थी। माता कूष्मांडा जीवन, ऊर्जा और आध्यात्मिक शक्ति का प्रतिनिधित्व करती हैं। माना जाता है कि उनके भीतर से निकलने वाली दिव्य ऊर्जा ही पूरे ब्रह्मांड में जीवन का आधार बनती है। इसी ऊर्जा को प्राण ऊर्जा भी कहा जाता है, जो हर जीवित प्राणी में प्रवाहित होती है। 

माता कूष्मांडा सिंह पर सवार रहती हैं और उनकी आठ भुजाएं होती हैं। उनके हाथों में अलग-अलग अस्त्र, जपमाला और अमृत से भरा कलश होता है। उनके हाथों में मौजूद ये वस्तुएं शक्ति, साहस और ऊर्जा का प्रतीक हैं। उनका प्रिय रंग रॉयल ब्लू माना जाता है, जो शक्ति और समृद्धि का प्रतीक है। नवरात्रि के दौरान भक्त उन्हें चमेली के सुगंधित फूल अर्पित करते हैं।
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नवरात्रि मां स्कंदमाता - फोटो : Amar Ujala
पांचवा दिन: मां स्कंदमाता
माता दुर्गा का पांचवां स्वरूप मां स्कंदमाता हैं, जिसकी पूजा नवरात्रि के पांचवें दिन की जाती है। उन्हें शक्ति और मातृत्व का प्रतीक माना जाता है। वह अपने भक्तों की एक मां की तरह रक्षा और पालन-पोषण करती हैं। मान्यता है कि जो भक्त स्कंदमाता की पूजा करता है, उसे माता के साथ-साथ भगवान कार्तिकेय का भी आशीर्वाद मिलता है। उन्हें सौभाग्य और समृद्धि देने वाली देवी माना जाता है।

माता स्कंदमाता सिंह पर सवार रहती हैं और अपनी गोद में पुत्र कार्तिकेय को धारण करती हैं। उनकी चार भुजाएं होती हैं। दो हाथों में वह कमल का फूल लिए रहती हैं और एक हाथ में अपने पुत्र को थामे रहती हैं। उनका प्रिय रंग पीला माना जाता है, जो मां के स्नेह और ममता का प्रतीक है। भक्त उन्हें प्रसन्न करने के लिए पीले गुलाब अर्पित करते हैं।
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नवरात्रि मां कात्यायनी - फोटो : Amar Ujala
छठा दिन: मां कात्यायनी
मां कात्यायनी को माता दुर्गा का छठा दिव्य स्वरूप माना जाता है, जिनकी पूजा नवरात्रि के छठे दिन की जाती है। यह माता दुर्गा के वीर और युद्ध करने वाले रूप को दर्शाता है। भद्रकाली और चंडिका को भी उनका शक्तिशाली स्वरूप माना जाता है। माता कात्यायनी उस अवस्था का प्रतीक हैं, जब व्यक्ति बिना किसी मोह या लगाव के जीवन को समझने लगता है। सरल शब्दों में यह आत्मज्ञान की स्थिति होती है, जब इंसान समझता है कि वह केवल शरीर नहीं बल्कि एक आत्मा है।

यह चेतना की वह अवस्था है, जब भीतर की ऊर्जा जागृत होकर अंतर्ज्ञान का रूप ले लेती है। यही माता कात्यायनी की दिव्य ऊर्जा मानी जाती है। उनका प्रिय रंग हरा माना जाता है, जो जीवन में संतुलन, विकास, शांति और सुकून का प्रतीक है। भक्त उन्हें प्रसन्न करने के लिए गेंदा के फूल अर्पित करते हैं और उनका आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।

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नवरात्रि मां कालरात्रि - फोटो : Amar Ujala
सातवां दिन: मां कालरात्रि
माता दुर्गा का सातवां स्वरूप मां कालरात्रि हैं, जिनकी पूजा नवरात्रि के सातवें दिन की जाती है। उनका यह स्वरूप बुराई और नकारात्मक शक्तियों के नाश का प्रतीक है। हालांकि वह अपने भक्तों और अच्छे लोगों के प्रति दयालु और कृपालु रहती हैं। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार माता कालरात्रि ने चंड और मुंड नामक राक्षसों का वध किया था। अपनी प्रचंड शक्ति के कारण उन्हें “रात्रि” भी कहा जाता है, जिसका अर्थ है मृत्यु की रात। 

वह गधे पर सवार रहती हैं और उनके चार हाथ होते हैं। उनके हाथों में तलवार और वज्र होता है, जबकि अन्य हाथों से वह भक्तों को आशीर्वाद देती हैं। माता कालरात्रि का रंग काला है, उनके बाल खुले और बिखरे होते हैं तथा उनका रूप काफी उग्र दिखाई देता है। उनका प्रिय रंग ग्रे माना जाता है, जो बुरी शक्तियों को नष्ट करने की शक्ति का प्रतीक है। भक्त उन्हें प्रसन्न करने के लिए कृष्ण कमल के फूल अर्पित करते हैं।

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नवरात्रि मां महागौरी - फोटो : Amar Ujala
आठवां दिन: मां महागौरी
माता दुर्गा का आठवां स्वरूप मां महागौरी हैं, जिनकी पूजा नवरात्रि के आठवें दिन की जाती है। हिंदू धर्म में माना जाता है कि वह अपने भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी करने की शक्ति रखती हैं। जो भक्त सच्चे मन से उनकी पूजा करता है, उसे दुखों से मुक्ति मिलती है। माता महागौरी अपने भक्तों को ज्ञान, सफलता और जीवन में सुख-समृद्धि प्रदान करती हैं। 

माता महागौरी बैल पर सवार रहती हैं, जो पवित्रता का प्रतीक है। उनके हाथों में त्रिशूल और डमरू होता है, जबकि अन्य हाथ आशीर्वाद और सुरक्षा देने की मुद्रा में होते हैं। इसे वरद और अभय मुद्रा कहा जाता है। माता महागौरी पवित्रता, दया और करुणा का प्रतीक हैं। उनका प्रिय रंग बैंगनी माना जाता है, जो गरिमा और वैभव का प्रतीक है। उन्हें प्रसन्न करने के लिए मोगरा के सुंदर फूल अर्पित किए जाते हैं।
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नवरात्रि मां सिद्धिदात्री - फोटो : Amar Ujala
नौवां दिन: मां सिद्धिदात्री
मां सिद्धिदात्री माता दुर्गा का नौवां और अंतिम स्वरूप हैं, जिनकी पूजा नवरात्रि के आखिरी दिन की जाती है। देवता और मनुष्य दोनों उनकी आराधना करते हैं, क्योंकि वह अपने भक्तों को सिद्धियां और दिव्य शक्तियां देने वाली देवी मानी जाती हैं। यह वह अवस्था है, जब व्यक्ति योग और साधना के माध्यम से आध्यात्मिक अनुशासन प्राप्त करता है। माता सिद्धिदात्री को असंभव को संभव बनाने वाली देवी भी कहा जाता है। जो व्यक्ति सच्चे मन से उनकी पूजा करता है, वह अपनी सीमाओं से आगे बढ़कर सफलता प्राप्त कर सकता है। 

माता सिद्धिदात्री कमल के फूल या सिंह पर विराजमान रहती हैं। उनकी चार भुजाएं होती हैं और उनके हाथों में कमल, चक्र, गदा और शंख होते हैं। उनका प्रिय रंग मोरपंखी हरा माना जाता है, जो अज्ञान के अंत और ज्ञान की ओर बढ़ने का प्रतीक है। इन्हें प्रसन्न करने के लिए चंपा के फूल अर्पित किए जाते हैं। माता अपने भक्तों को उनके सच्चे प्रयासों का फल देती हैं।


 

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं, ज्योतिष, पंचांग, धार्मिक ग्रंथों आदि पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।

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