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Udaya Tithi: उदयातिथि के आधार पर ही क्यों मनाए जाते हैं त्योहार ? जानिए इसका महत्व

Sun, 24 Aug 2025 11:29 AM IST
मेघा कुमारी शैली प्रकाश, अमर उजाला

सार

Udaya Tithi: तिथियों को दो भागों में बांटा गया है। पूर्णिमा से अमावस्या तक कृष्ण पक्ष की 15 और फिर अमावस्या से पूर्णिमा तक शुक्ल पक्ष की 15 तिथि मिलाकर कुल 30 तिथियां होती हैं। 
 
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Udya Tithi - फोटो : adobe
Udaya Tithi: हिन्दू कैलेंडर में 12 माह का एक वर्ष, 30 दिन का एक माह और 7 दिन का एक सप्ताह होता है। हिंदू व्रत, पर्व या त्योहार तिथियों पर ही आधारित होते हैं ऐसे में समझ में नहीं आता है कि कौन से दिन की तिथि को व्रत या त्योहार मनाना सही है। तिथि और दिन में अंतर होता है। तिथि 19 से 24 घंटे की होती है, जबकि दिन और रात मिलाकर 24 घंटे होते हैं। इसलिए अक्सर एक ही दिन या दिनांक में 2 तिथियां रहती हैं। ऐसे में आइए इसके बारे में विस्तार से जानते हैं।
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Udya Tithi importance - फोटो : adobe
30 तिथियों के नाम
पूर्णिमा (पूरनमासी), प्रतिपदा (पड़वा), द्वितीया (दूज), तृतीया (तीज), चतुर्थी (चौथ), पंचमी (पंचमी), षष्ठी (छठ), सप्तमी (सातम), अष्टमी (आठम), नवमी (नौमी), दशमी (दसम), एकादशी (ग्यारस), द्वादशी (बारस), त्रयोदशी (तेरस), चतुर्दशी (चौदस) और अमावस्या (अमावस)। 
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Udya Tithi importance - फोटो : freepik
कृष्ण और शुक्ल पक्ष
तिथियों को दो भागों में बांटा गया है। पूर्णिमा से अमावस्या तक कृष्ण पक्ष की 15 और फिर अमावस्या से पूर्णिमा तक शुक्ल पक्ष की 15 तिथि मिलाकर कुल 30 तिथियां होती हैं। हालांकि तिथियों के नाम 16 ही होते हैं।

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तिथियों के अनुसार व्रत रखने और त्योहार मनाने के पहले यह जानना जरूरी है कि हिंदू धर्म में कौन सा पर्व दिन में और कौन सा पर्व रात में मनाया जाता है। - फोटो : ANI
कब मनाएं त्योहार और रखें व्रत?
तिथियों के अनुसार व्रत रखने और त्योहार मनाने के पहले यह जानना जरूरी है कि हिंदू धर्म में कौन सा पर्व दिन में और कौन सा पर्व रात में मनाया जाता है। इसी के साथ ही कौन से व्रत का सूर्य से संबंध है और कौन से व्रत का संबंध चंद्रमा से है। जैसे दीपावली, दशहरा, नरक चतुर्दशी, नवरात्रि, शिवरात्रि, होली, जन्माष्टमी और लोहड़ी जैसे त्योहारों को रात में मनाए जाने का महत्व है। इसलिए इसमें उदया तिथि को महत्व नहीं देते हैं। गणेश चतुर्थी, पितृ पक्ष, रामनवमी, हनुमान जयंती, रक्षाबंधन, भाई दूज, गोवर्धन पूजा, रथ सप्तमी, छठ पूजा आदि त्योहार दिन में मनाते हैं इसलिए इसमें उदया तिथि को लेते हैं। इसी प्रकार एकादशी, चतुर्थी और प्रदोष का व्रत भी उदया तिथि के अनुसार रखना चाहिए, लेकिन स्मार्त और वैष्णव मत में इसको लेकर मतभेद है। 
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उदया तिथि का अर्थ है कि वह तिथि जो सूर्योदय के साथ शुरू होती है। जैसे कि कोई तिथि सूर्योदय के साथ प्रथम प्रहर में प्रारंभ होती है तो उसे उदया तिथि मानते हैं। - फोटो : ANI
उदया तिथि क्या होती है ?
उदया तिथि का अर्थ है कि वह तिथि जो सूर्योदय के साथ शुरू होती है। जैसे कि कोई तिथि सूर्योदय के साथ प्रथम प्रहर में प्रारंभ होती है तो उसे उदया तिथि मानते हैं। दूसरा यह कि मान लो कि कोई तिथि किसी भी दिनांक में दोपहर में या शाम को प्रारंभ होकर अगले दिन दोपहर में या शाम को समाप्त हो रही है तो दिन के पर्व या व्रत अगले दिन मनाते हैं क्योंकि अगले दिन वह तिथि सूर्योदय के समय विद्यमान थी। इसी के साथ ही यदि मान लो कि चतुर्थी तिथि प्रात: 10:30 पर समाप्त हो रही है और इसके बाद पंचमी तिथि प्रारंभ हो जाती है तो भी पूरे दिन चतुर्थी का ही प्रभाव माना जाएगा। इसलिए अगले दिन ही पंचमी को मनाया जाएगा।
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पंचांग अनुसार कोई भी उदया तिथि की समयावधि 19 से 24 घण्टे से अधिक नहीं हो सकती हैं। तिथियों का ये अंतराल सूर्य और चंद्रमा के अंतर से तय होता है - फोटो : Freepik
इस उदाहरण से समझें कि गणेश चतुर्थी के पर्व में मध्याह्न के समय मौजूद (मध्याह्न व्यापिनी) चतुर्थी ली जाती है क्योंकि गणेशजी का जन्म इसी समय में हुआ था। 26 अगस्त को मध्यान्ह काल समाप्ति के बाद चतुर्थी तिथि प्रारंभ हो रही है। दिन का दूसरा प्रहर मध्याह्न काल रहता है जो सुबह 9:00 से दोपहर 12:00 बजे तक रहता है। इस मान से अगले दिन यानी 27 अगस्त को ही गणेश चतुर्थी मनाई जाएगी क्योंकि उस दौरान मध्याह्न व्यापिनी तिथि रहेगी। यही सिद्धांत रक्षाबंधन के पर्व में भी लागू होता है और रामनवमी पर भी। पितृपक्ष में भी मध्याह्न काल में ही तर्पण होता है इसलिए मध्याह्न व्यापिनी तिथि होना जरूरी है। 
 
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udya tithi importance in festival - फोटो : freepik
पंचांग अनुसार कोई भी उदया तिथि की समयावधि 19 से 24 घण्टे से अधिक नहीं हो सकती हैं। तिथियों का ये अंतराल सूर्य और चंद्रमा के अंतर से तय होता है लेकिन यदि दिवस के अन्तराल में कोई भी तिथि चल रही हो और उक्त दिवस के मध्य से अगली तिथि का प्रारम्भ हो गया हो, तो उसका मान पहली तिथि से अधिक नहीं होगा। अर्थात अगली तिथि का मान अगले दिन सूर्योदय से ही मान्य होता हैं क्योंकि पंचांग के अनुसार भी सूर्योदय के साथ ही दिवस बदलता है। अर्थात सूर्य के साथ उत्पन्न होने वाली तिथि को उदया तिथि कहा जाता हैं। परंतु रात्रि के और दिन के पर्व एवं व्रत के अनुसार सिद्धांत में बदलाव होता है जो इस प्रकार है।
  • मध्य व्यापिनी (किसी भी तिथि के मध्याह्न भाग में)
  • प्रदोष व्यापिनी (किसी भी तिथि के अपराह्न काल/भाग में) 
  • अर्द्ध व्यापिनी (किसी भी तिथि के सायान्ह भाग में) 
  • निशीथ व्यापिनी (किसी भी तिथि के रात्रि भाग में)
 

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करवा चौथ व्रत में कार्तिक मास कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को चंद्रमा के पूजन का विधान है, तो ऐसे में यदि इसी तिथि में उसी दिन की रात्रि में चंद्र उदय हो रहा है तो फिर उसी दिन करवा चौथ का व्रत रखा जाएगा। - फोटो : adobe
  • राम जी का जन्म चैत्र शुक्ल नवमी तिथि को मध्यान्ह काल में हुआ था, इसलिए मध्य व्यापिनी नवमी तिथि में जन्मोत्सव मनाते हैं। इसी प्रकार रक्षाबंधन के त्योहार में भी यही नियम लागू होता है। 
  • श्री कृष्ण का जन्म भाद्रपद मास कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मध्यरात्रि में अर्थात निशीथ व्यापिनी अष्टमी तिथि को हुआ था इसलिए रात्रि में जन्मोत्सव मनाते हैं। जैसे यदि कोई भी दिन दिन में कभी भी प्रारंभ होकर मध्यरात्रि के बाद तक रहती है तो उसी दिन जन्माष्टमी मनाना चाहिए। इसका सूर्योदय की उदया तिथि से कोई संबंध नहीं। अष्टमी तिथि के समय निशिथ काल होना चाहिए।
  • करवा चौथ व्रत में कार्तिक मास कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को चंद्रमा के पूजन का विधान है, तो ऐसे में यदि इसी तिथि में उसी दिन की रात्रि में चंद्र उदय हो रहा है तो फिर उसी दिन करवा चौथ का व्रत रखा जाएगा। यह व्रत कार्तिक मास कृष्ण पक्ष की चतुर्थी तिथि को चंद्रमा के उदय ही चौथ तिथि का पर्व समय है, ना कि चौथ तिथि के सूर्योदय काल से। अर्थात सूर्योदय के साथ चौथ आरम्भ होने के दिवस को करवा चौथ व्रत न होकर उसी दिवस को होगा जिस दिवस में चतुर्थी तिथि को चांद की पूजा हो सके। इसी प्रकार जिन दिन रात्रि में कार्तिक मास की अमावस्या रहती है उस दिन की रात्रि में दीपावली मनाते हैं।
 


डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): 
यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं, ज्योतिष, पंचांग, धार्मिक ग्रंथों आदि पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।
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