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Krishna Janmashtami 2026: श्रीकृष्ण क्यों चुराते थे माखन? दही हांडी के पीछे है बाल लीला का खास राज

Tue, 01 Sep 2026 01:30 PM IST
श्वेता सिंह धर्म डेस्क, अमर उजाला

सार

Krishna Janmashtami 2026: भगवान श्रीकृष्ण की बाल लीलाओं में माखन चोरी की लीला सबसे मनमोहक मानी जाती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि श्रीकृष्ण के माखन चुराने के पीछे एक गहरा आध्यात्मिक रहस्य छिपा है? जानें दही हांडी और कृष्ण की इस बाल लीला का खास महत्व।
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krishna janmashtami 2026 - फोटो : amar ujala
Krishna Janmashtami 2026: जन्माष्टमी पर भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप की पूजा की जाती है और उनकी मनमोहक बाल लीलाओं का स्मरण किया जाता है। इनमें माखन चोरी की लीला सबसे ज्यादा लोकप्रिय है। नटखट कान्हा का गोपियों के घर जाकर माखन चुराना और दही की हांडी फोड़ना आज भी भक्तों को खूब आकर्षित करता है। लेकिन क्या श्रीकृष्ण वास्तव में माखन खाने के लिए ही उसे चुराते थे? धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, उनकी इस लीला में प्रेम, भक्ति और आत्मीयता का गहरा संदेश छिपा है।
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श्रीकृष्ण को क्यों कहा जाता है माखन चोर?
भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप को उनकी चंचल और मनमोहक लीलाओं के लिए जाना जाता है। ब्रज में बाल गोपाल अक्सर गोपियों के घर पहुंच जाते थे और वहां रखे माखन-दही को अपने सखाओं के साथ मिलकर निकाल लेते थे। इसी कारण उन्हें प्रेम से ‘माखन चोर’ कहा जाने लगा। धार्मिक कथाओं में बताया जाता है कि श्रीकृष्ण के घर में भी माखन-दही की कोई कमी नहीं थी। ऐसे में उनके लिए दूसरे घरों से माखन चुराने की कोई आवश्यकता नहीं थी। यही बात उनकी इस लीला को साधारण चोरी से अलग करती है। भक्त परंपरा में इसे भगवान और उनके भक्तों के बीच प्रेमपूर्ण संबंध का प्रतीक माना गया है।

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माखन चोरी के पीछे छिपा है भक्ति का संदेश - फोटो : instagram

माखन चोरी के पीछे छिपा है भक्ति का संदेश
माखन दूध को मथकर प्राप्त किया जाता है। इसी कारण आध्यात्मिक दृष्टि से माखन को हृदय की शुद्धता और प्रेम का प्रतीक माना जाता है। मान्यता है कि जिस तरह दूध को मथने के बाद उसका सार यानी माखन सामने आता है, उसी तरह साधना, भक्ति और भगवान के निरंतर स्मरण से मनुष्य के भीतर छिपा प्रेम भी प्रकट होता है। इस दृष्टि से श्रीकृष्ण का माखन चुराना केवल एक बाल लीला नहीं, बल्कि भक्त के निर्मल हृदय को अपने प्रेम में समेट लेने का संकेत माना जाता है। यानी कान्हा को माखन से ज्यादा अपने भक्तों का प्रेम प्रिय था।

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गोपियों के घर ही क्यों जाते थे कान्हा? - फोटो : adobe stock

गोपियों के घर ही क्यों जाते थे कान्हा?
ब्रज की गोपियां कृष्ण की बाल लीलाओं से अत्यंत प्रभावित थीं। वे प्रतिदिन दूध-दही से माखन तैयार करती थीं और कृष्ण के प्रति प्रेम भाव रखती थीं। मान्यता है कि गोपियों का मन हमेशा कृष्ण के स्मरण में लगा रहता था। जब कृष्ण उनके घर माखन चुराने पहुंचते, तो उनकी शिकायतें भी कहीं न कहीं कान्हा के प्रति प्रेम को व्यक्त करती थीं। वे यशोदा मैया से कृष्ण की शिकायत करतीं, लेकिन मन ही मन उनके दोबारा आने की प्रतीक्षा भी करती थीं। इस तरह माखन चोरी की लीला ने कृष्ण और ब्रजवासियों के बीच आत्मीयता को और गहरा किया।

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दही हांडी का कृष्ण की बाल लीला से क्या संबंध है - फोटो : freepik

दही हांडी का कृष्ण की बाल लीला से क्या संबंध है?
जन्माष्टमी के अवसर पर दही हांडी का आयोजन विशेष आकर्षण का केंद्र रहता है। इसमें ऊंचाई पर दही या माखन से भरी हांडी बांधी जाती है और लोग मानव पिरामिड बनाकर उसे फोड़ने का प्रयास करते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इसका संबंध कृष्ण की उसी बाल लीला से है जिसमें वे अपने सखाओं के साथ मिलकर ऊंचाई पर रखे माखन-दही के मटके तक पहुंचते थे। गोपियां माखन को ऊंचाई पर रख देती थीं ताकि नटखट कान्हा उसे आसानी से न निकाल सकें। लेकिन कृष्ण अपनी टोली के साथ मिलकर मटके तक पहुंचने का उपाय खोज लेते थे। दही हांडी की परंपरा इसी चंचल लीला की याद दिलाती है।

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कृष्ण की बाल लीलाओं में मटकी फोड़ना भी खास महत्व रखता है। - फोटो : free pik

कृष्ण ने मटकी क्यों फोड़ी?
कृष्ण की बाल लीलाओं में मटकी फोड़ना भी खास महत्व रखता है। आध्यात्मिक व्याख्या में मटकी को मनुष्य के अहंकार और सांसारिक मोह का प्रतीक माना जाता है। मटकी के भीतर छिपा माखन शुद्ध प्रेम का प्रतीक है और मटकी का टूटना इस बात का संकेत माना जाता है कि जब अहंकार की परतें टूटती हैं, तब हृदय में छिपा प्रेम प्रकट होता है। इसलिए कृष्ण की मटकी फोड़ने वाली लीला को केवल शरारत के रूप में नहीं देखा जाता। इसमें भक्तों के लिए यह संदेश भी माना जाता है कि भगवान तक पहुंचने के लिए मन को प्रेम और भक्ति से निर्मल करना चाहिए।

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krishna janmashtami 2026 - फोटो : amar ujala

बंदरों को भी बांट देते थे माखन
कृष्ण की माखन चोरी की कथाओं में यह भी उल्लेख मिलता है कि वे चुराया हुआ माखन अकेले नहीं खाते थे। वे उसे अपने सखाओं और बंदरों तक के साथ बांट देते थे। इस प्रसंग को प्रेम और उदारता से जोड़कर देखा जाता है। भगवान के पास जो आता है, उसे केवल अपने तक सीमित रखने के बजाय दूसरों के साथ बांटने की भावना भी कृष्ण की बाल लीलाओं से जुड़ी हुई मानी जाती है। यही वजह है कि कृष्ण की शरारतों में भी भक्तों को प्रेम, करुणा और अपनत्व का संदेश दिखाई देता है।

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krishna janmashtami 2026 - फोटो : amar ujala

यशोदा मैया के लिए भी खास थी कृष्ण की माखन लीला
कृष्ण की माखन चोरी की सबसे लोकप्रिय कथाओं में माता यशोदा और बाल कृष्ण का प्रसंग आता है। जब गोपियां कृष्ण की शिकायत लेकर यशोदा के पास पहुंचती थीं, तो यशोदा मैया उन्हें समझाने का प्रयास करती थीं। लेकिन कृष्ण की मासूमियत और उनकी चंचल मुस्कान के सामने उनकी शिकायतें भी प्रेम में बदल जाती थीं। यही वात्सल्य भाव कृष्ण की बाल लीलाओं की सबसे बड़ी विशेषता माना जाता है। भगवान का बाल रूप भक्तों को यह अनुभव कराता है कि ईश्वर से संबंध केवल भय और श्रद्धा का नहीं, बल्कि प्रेम, स्नेह और आत्मीयता का भी हो सकता है।

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krishna janmashtami 2026 - फोटो : amar ujala

जन्माष्टमी पर क्यों याद की जाती है माखन चोरी की लीला?
जन्माष्टमी भगवान श्रीकृष्ण के अवतरण का पर्व है। इस दिन उनके जन्म से जुड़ी कथाओं के साथ-साथ उनकी बाल लीलाओं का भी स्मरण किया जाता है। माखन चोरी की लीला इनमें इसलिए खास है क्योंकि इसमें कृष्ण का बाल स्वरूप, उनकी चंचलता और ब्रजवासियों के साथ उनका प्रेमपूर्ण संबंध दिखाई देता है। जन्माष्टमी पर मंदिरों और घरों में बाल गोपाल को माखन-मिश्री का भोग लगाने की परंपरा भी इसी भाव से जुड़ी मानी जाती है। भक्त कान्हा के बाल रूप को माखन अर्पित करके उनके प्रति अपना प्रेम और भक्ति व्यक्त करते हैं।

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krishna janmashtami 2026 - फोटो : amar ujala

माखन चोरी की लीला हमें क्या सिखाती है?
श्रीकृष्ण की माखन चोरी की कथा को अगर आध्यात्मिक दृष्टि से समझें तो इसमें कई संदेश मिलते हैं। सबसे बड़ा संदेश यह है कि भगवान को बाहरी वैभव से ज्यादा सच्चा प्रेम प्रिय है। माखन को हृदय की निर्मलता का प्रतीक माना जाता है। जिस तरह मंथन के बाद दूध से माखन निकलता है, उसी तरह निरंतर भक्ति और भगवान के स्मरण से मनुष्य के भीतर का प्रेम जागृत होता है। दही हांडी भी सामूहिकता और सहयोग का संदेश देती है। एक व्यक्ति अकेले ऊंची हांडी तक नहीं पहुंच सकता, लेकिन सभी मिलकर प्रयास करें तो लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है। इसीलिए कृष्ण की यह बाल लीला आज भी धार्मिक आस्था के साथ-साथ सामाजिक उत्सव का रूप ले चुकी है।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं, ज्योतिष, पंचांग, धार्मिक ग्रंथों आदि पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।

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