Krishna Janmashtami 2022: भगवान श्री कृष्ण के जीवन का उद्देश्य था कि वह पापों का अंत करके रिश्तो में सुधार कर सकें। श्री कृष्ण ने अपना पूरा बचपन वृन्दावन में माताओं और बाल बालों के साथ बिताया। वहीं जैसे-जैसे वह बड़े होने लगे उन्हें अत्याचारों से पीड़ित जनता की खबर आने लगी। ऐसे में भगवान श्री कृष्ण ने पापों को नष्ट करने के लिए, 11 साल की उम्र में वृन्दावन छोड़ने का फैसला लिया। एक दिन श्री कृष्ण को समाचार मिला कि अक्रूर उन्हें मथुरा ले जाने के लिए वृन्दावन आये है। इस पर कृष्ण निर्भीक होकर अक्रूर से मिले। इसके बाद वह उन्हें अपनी पिता नंद के पास ले गये। यहां अक्रूर ने कंस का धनुर्याग-संदेश सुनाते हुए कहा कि, 'राजा कंस ने आपको गोपों और बच्चों सहित मेला देखने के लिए बुलाया है।' इसके बाद अक्रूर दूसरे ही दिन सवेरे श्री कृष्ण और बलराम को लेकर मथुरा के लिए निकल पड़े। हालांकि, श्री कृष्ण के वहां जाने से कोई खुश नहीं था।
विज्ञापन
2 of 5
जानिए कौन थे अक्रूर
- फोटो : iStock
नंद बच्चों (श्री कृष्ण और बलराम) को मथुरा न भेजते, लेकिन अक्रूर ने नंद को ये समझाया कि कृष्ण का ये कर्तव्य है कि वह अपने माता-पिता (वासुदेव और देवकी) से मिले और उनको कष्टों से मुक्त करें। ऐसे में नंद ने भी उनको नहीं रोका।
विज्ञापन
3 of 5
जानिए कौन थे अक्रूर
- फोटो : iStock
हालांकि, मथुरा पहुंचने के बाद अक्रूर ने कृष्ण को पहले माता-पिता से मिलाना उचित नहीं समझा। इसका कारण ये है कि अगर ये बाद कंस को पता चलती तो, वह भड़क जाएगा और बना-बनाया काम व्यर्थ हो जायगा। सन्ध्या के समय मथुरा पहुंचने पर अक्रूर दोनों भाइयों को अपने घर ले गये थे।
4 of 5
जानिए कौन थे अक्रूर
- फोटो : iStock
भगवान श्री कृष्ण ने 11 साल 6 महीने की उम्र में अपनी मथुरा लीला शुरू की। इस दौरान उन्होंने मथुरा में प्रवेश करने के साथ अपने मामा कंस द्वारा किए गए अत्याचारों को समाप्त करने का फैसला कर लिया था। कृष्ण ने शिव रात्रि के दिन कंस का वध किया।
कौन थे अक्रूर?
अगर आप ये सोच रहे हैं कि अक्रूर आखिर कौन थे। तो बता दें कि, कृष्णकालीन एक यादववंशी मान्य व्यक्ति थे। अक्रूर के पिता का नाम श्वफल्क था, जिन्हें जयन्त के नाम से भी जाना जाता है। साथ ही सात्वत वंश में उत्पन्न वृष्णि के पौत्र थे। काशी के राजा ने अपनी पुत्री गांदिनी का विवाह जयन्त के साथ किया था। इन्हीं दोनों की संतान होने के चलते अक्रूर श्वाफल्कि तथा गांदिनीनंदन के नाम से भी जाने जाते थे। अक्रूर, कंस के कहने पर ही बलराम तथा कृष्ण को वृन्दावन से मथुरा लाए।