पौराणिक कथा के अनुसार, वीरवती नाम की एक महिला थी और उसके सातों भाई उससे बहुत प्रेम करते थे। बड़े हो जाने पर वीरवती की शादी हो जाती है। कुछ समय बाद करवा चौथ का व्रत आ जाता है। वह निर्जला व्रत रखती है, जिससे उसकी तबीयत खराब होने लगती है। भाई वीरवती के स्वास्थ्य को देखकर परेशान होने लगते हैं और एक योजना बनाते हैं।
वीरवती का एक भाई पेड़ की ओट में छलनी के पीछे जलता हुआ दीपक रख देता है और एक भाई बहन से कह देता है कि देखो वीरवती चंद्रमा निकल आया, तुम अब चंद्रमा को अपना व्रत खोल सकती हो। बहन भी भाई की बात में आकर झूठे चंद्रमा को अर्घ्य दे देती है और खाने बैठ जाती है।
वीरवती जब अपना पहला टुकड़ा मुंह में डालती है तो छींक आ जाती है, दूसरे पर बाल आ जाता है और तीसरे टुकड़ों को जब मुंह में डालती है तब तक उसके पति की मौत की खबर आ जाती है। वीरवती की भाभी उसको पूरी सच्चाई बताती हैं आखिर उनके साथ ऐसा क्यों हुआ। वीरवती अपने पति को फिर से जीवित होने की कामना करती हैं और पूरे साल चतुर्थी को निर्जला व्रत रखती है।
फिर जब करवा चौथ का व्रत आता है तो पूरे विधि विधान से पूजा करके व्रत रखती हैं और चंद्रमा को देखकर अर्घ्य देकर व्रत तोड़ती हैं। इसके बाद छलनी से चंद्रमा को देखकर अपनी पति का चेहरा देखती हैं। करवा चौथ माता उसकी मनोकामना पूरी करती हैं और उसका पति फिर से जीवित हो जाता है। मान्यता है कि पतिव्रत महिला से कोई भी किसी भी तरह का छल न कर पाए इसलिए छलनी से चांद को देखा जाता है।