सावन के महीने को भगवान शिव का प्रिय महीना माना जाता है। यही कारण है कि इस दौरान शिव की प्रिय कांवड़ यात्रा निकाली जाती है। क्या आपको मालूम है कि इसकी शुरुआत कब और किसने की? आइए जानते हैं कांवड़ यात्रा से जुड़ी मान्यताओं के बारे में...
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kanwar yatra 2018
- फोटो : amar ujala
माना जाता है कि सबसे पहले कांवडिया भगवान राम थें। उन्होंने सुल्तानगंज से कांवड़ में गंगाजल लाकर बाबाधाम के शिवलिंग का जलाभिषेक किया था। कांवड़ यात्रा से जुड़ी कई कथा प्रचलित है। मान्यता है कि सबसे पहले भगवान शिव के परमभक्त परशुराम ने सबसे पहली कांवड़ उठाई थी। उन्हें पहला कांवड़ भी माना जाता है।
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कुछ लोगों का मानना है कि श्रवण कुमार ने कांवड की परंपरा की शुरुआत की थी। वह अपने दृष्टिहीन माता-पिता की हरिद्वार में गंगा स्नान करने की इच्छा को पूरा करने के लिए उन्हें कांवड़ में बैठाकर हरिद्वार गंगा स्नान करान लाए थे। माना जाता है तभी से कांवड़ यात्रा की शुरुआत हुई।
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पुराणों केे अनुसार इस यात्रा की शुरुआत समुद्र मंथन के समय हुई थी। समुद्रमंथन के दौरान निकले हलाहल विष को पीने के बाद भगवान शिव का गला नीला हो गया था। साथ ही उनके शरीर में बुरा असर पड़ने लगे थे। जिसे देखकर देवता चिंतित हो उठे। विष के प्रभाव को कम करने के लिए चिंतित देवताओं ने पवित्र और शीतलता का पर्याय गंगा जंल शिव के शरीर में चढ़ाया।
गंगा जल से शिवजी का जलाभिषेक करने से कुछ ही समय में देवताओं की मेहनत रंग लाई और भोलेनाथ का शरीर सामान्य होने लगा। इसी कार्य को आगे बढ़ाते हुए कांवडिये हरिद्वार से गंगा जल लेकर नीलकंठ महादेव में चढ़ाते हैं। यह यात्रा सदियों से चली आ रही है।