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Ganga Dussehra 2022: जानिए कैसे आईं धरती पर गंगा, स्न्नान करने से कौन से 10 पापों से मिलती है मुक्ति

Thu, 09 Jun 2022 10:06 AM IST
विनोद शुक्ला धर्म डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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Ganga Dussehra 2020: गंगा दशहरा के दिन गुरु-चंद्रमा और मंगल का द्दष्टि संबंध बन रहा है इस कारण से गजकेसरी और महालक्ष्मी योग का संयोग है। - फोटो : अमर उजाला
Ganga Dussehra 2022: ज्येष्ठ माह के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को विष्णुपदी, पुण्यसलिला मां गंगा का पृथ्वी पर अवतरण हुआ,अतः यह दिन गंगा दशहरा (ज्येष्ठ शुक्ल दशमी) या लोकभाषा में जेठ का दशहरा के नाम से जाना जाता है। इस बार दशमी तिथि 9 जून को प्रातः काल 8 बजकर 21 मिनट से प्रारंभ होकर 10 जून को सायंकाल 7 बजकर 25 मिनट तक रहेगी। उदयातिथि के आधार पर गंगा दशहरा 10 जून को मनाया जाएगा। साथ ही इस दिन हस्त नक्षत्र और व्यतिपात योग भी रहेगा, इस योग में स्नान और दान करना अति लाभदायक होता है।
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गंगा दशहरा के पर्व पर यमुना के घाट पर भक्त - फोटो : अमर उजाला
दस तरह के पाप से मिलता है छुटकारा 
पुराण कहते हैं कि इस दिन गंगाजल के सेवन या गंगा स्नान करने से अनजाने में हुए पाप और कष्टों से मुक्ति मिल जाती है एवं दस प्रकार के पाप नष्ट होते हैं।

दैहिक पाप
बिना दी हुई वस्तु को लेना,निषिद्ध हिंसा,परस्त्री संगम-यह तीन प्रकार का दैहिक पाप माना गया है।
 
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वाणी से पाप
कठोर वचन मुंह से निकालना,झूट बोलना,सब ओर चुगली करना एवं वाणी द्वारा मन को दुखाना-ये वाणी से होने वाले चार प्रकार के पाप हैं।

मानसिक पाप
दूसरे के धन को लेने का विचार करना,मन से किसी का बुरा सोचना और असत्य वस्तुओं में आग्रह रखना-ये तीन प्रकार के मानसिक पाप कहे गए हैं। यानी कि दैहिक, वाणी द्वारा एवं मानसिक पाप,ये सभी गंगा दशहरा के दिन पतितपावनी गंगा स्नान से धुल जाते हैं।
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गंगा दशहरा - फोटो : अमर उजाला
ऐसे आई धरती पर मां गंगा
विष्णु पुराण में लिखा है कि गंगा का नाम लेने,सुनने,उसे देखने,उसका जल पीने,स्पर्श करने,उसमें स्नान करने तथा सौ योजन (कोस)से भी गंगा नाम का उच्चारण करने मात्र से मनुष्य के तीन जन्मों तक के पाप नष्ट हो जाते हैं। पदमपुराण की कथा के अनुसार आदिकाल में ब्रह्माजी ने सृष्टि की 'मूलप्रकृति' से कहा-''हे देवी!तुम समस्त लोकों का आदिकारण बनो,मैं तुमसे ही संसार की सृष्टि प्रारंभ करूँगा''। ब्रह्मा जी के कहने पर मूलप्रकृति-गायत्री  सरस्वती,लक्ष्मी,उमादेवी,शक्तिबीजा,तपस्विनी और धर्मद्रवा इन सात स्वरूपों में प्रकट हुईं। इनमें से सातवीं 'पराप्रकृति धर्मद्रवा'को सभी धर्मों में प्रतिष्ठित जानकार ब्रह्माजी ने अपने कमण्डलु में धारण कर लिया। राजा बलि के यज्ञ के समय वामन अवतार लिए जब भगवान विष्णु का एक पग आकाश एवं ब्रह्माण्ड को भेदकर ब्रह्मा जी के सामने स्थित हुए,उस समय अपने कमण्डलु के जल से ब्रह्माजी ने श्रीविष्णु के चरण का पूजन किया। चरण धोते समय श्री विष्णु का चरणोदक हेमकूट पर्वत पर गिरा। वहां से भगवान शिव के पास पहुंचकर यह जल गंगा के रूप में उनकी जटाओं में समा गया।

गंगा बहुत काल तक शिव की जटाओं में भ्रमण करती रहीं। तत्पश्चात सूर्यवंशी राजा भगीरथ ने अपने पूर्वज सगर के साठ हज़ार पुत्रों का उद्धार करने हेतु गंगा को धरती पर लेन के लिए शिवजी की घोर तपस्या की। भगवान शंकर ने प्रसन्न होकर गंगा को पृथ्वी पर उतार दिया। पुराणों के अनुसार ज्येष्ठ शुक्ल दशमी, हस्त नक्षत्र में गंगाजी शिवजी की जटाओं से निकलकर धरती पर आई थी। उस समय गंगाजी तीन धाराओं में प्रकट होकर तीनों लोकों में चली गयीं और संसार में त्रिस्रोता के नाम से विख्यात हुईं। शिव,ब्रह्मा तथा विष्णु-तीनों देवताओं के संयोग से पवित्र होकर गंगा त्रिभुवन को पवन करती हैं। 
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