गणेश आरती का मानवीय संदेश
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गणेश आरती का मानवीय संदेश
कृष्णा गुरुजी कई वर्षों से गणेश जी की आरती के भावों का मानवीयकरण करते हुए उन्हें सेवा से जोड़ने का कार्य कर रहे हैं। गणेश आरती की प्रसिद्ध पंक्ति है-
“अंधन को आंख देत, कोढ़िन को काया,
बांझन को पुत्र देत, निर्धन को माया।”
कृष्णा गुरुजी इसका मानवीय और वर्तमान समय के अनुरूप संदेश इस प्रकार प्रस्तुत करते हैं-
“अंधन को आंख देत”
इसका संदेश है कि हम नेत्रदान का संकल्प लें और दूसरों को भी इसके लिए प्रेरित करें। हमारे जाने के बाद हमारी आँखें किसी दृष्टिहीन व्यक्ति के जीवन में प्रकाश ला सकती हैं। किसी व्यक्ति को देखने की शक्ति देकर हम उसके जीवन में गणेश और विघ्नहर्ता बन सकते हैं।
“कोढ़िन को काया”
इस भावना के साथ कृष्णा गुरुजी कुष्ठाश्रमों में गणेश जी की स्थापना करके वहां सेवा का कार्य करते रहे हैं। कुष्ठ रोग से पीड़ित व्यक्तियों को केवल वस्तुओं की नहीं, बल्कि सम्मान, अपनत्व और सामाजिक स्वीकार्यता की भी आवश्यकता होती है। उनसे भेदभाव दूर करना भी गणेश सेवा है।
“बांझन को पुत्र देत”
पुरानी आरती में “बांझन को पुत्र देत” कहा गया है, लेकिन कृष्णा गुरुजी का सुझाव है कि वर्तमान समय में इसे-
“बांझन को गर्भ देत”
गाया जाना चाहिए। प्रार्थना संतान की होनी चाहिए, उसके लिंग की नहीं। इसी भावना के अंतर्गत IVF एवं सहायक प्रजनन तकनीकों के माध्यम से निःसंतान दंपतियों के जीवन में संतान-सुख लाने वाले चिकित्सकों का सम्मान किया जाता है।
“निर्धन को माया”
निर्धनता का स्थायी समाधान केवल धन बांटना नहीं, बल्कि शिक्षा, कौशल और रोजगार के अवसर उपलब्ध कराना है। कृष्णा गुरुजी मजदूरों और कर्मचारियों को यह संदेश देते हैं कि वे अपने बच्चों की शिक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दें, क्योंकि शिक्षा ही निर्धनता के चक्र को तोड़ सकती है।
भिक्षा नहीं, आत्मनिर्भरता का संदेश
कृष्णा गुरुजी भिक्षुकों के बीच जाकर उनसे कहते हैं-
“आप इस धरती पर केवल मांगने के लिए नहीं, कुछ देने के लिए भी आए हैं।” हर व्यक्ति के भीतर कोई न कोई योग्यता अवश्य होती है। आवश्यकता उस योग्यता को पहचानकर आत्मसम्मान और आत्मनिर्भरता के साथ जीवन जीने की है।