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गणेश चतुर्थी 2026: महाराष्ट्र से दक्षिण भारत तक अलग क्यों हैं गणेश पूजा के तरीके? जानें पूजा और उत्सव का अंतर

Tue, 08 Sep 2026 10:57 AM IST
श्वेता सिंह धर्म डेस्क, अमर उजाला

सार

गणेश चतुर्थी पूरे भारत में श्रद्धा और उत्साह से मनाई जाती है, लेकिन महाराष्ट्र से दक्षिण भारत तक इसकी पूजा-पद्धति और उत्सव की परंपराओं में खासा अंतर देखने को मिलता है। आखिर इन क्षेत्रीय परंपराओं की वजह क्या है?
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गणेश चतुर्थी 2026 - फोटो : amar ujala

Ganesh Chaturthi 2026: भगवान गणेश को विघ्नहर्ता और मंगलकर्ता माना जाता है। देशभर में गणेश चतुर्थी का पर्व श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। हालांकि, भारत के अलग-अलग राज्यों में इस त्योहार को मनाने की परंपरा एक जैसी नहीं है। महाराष्ट्र में जहां गणेशोत्सव बड़े सार्वजनिक आयोजनों, विशाल पंडालों और भव्य विसर्जन के लिए जाना जाता है, वहीं दक्षिण भारत के राज्यों में पूजा के साथ स्थानीय परंपराओं और रीति-रिवाजों की खास भूमिका रहती है।गणेश चतुर्थी 2026 में 14 सितंबर को मनाई जाएगी। इस दिन घरों और सार्वजनिक स्थानों पर भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित कर विशेष पूजा-अर्चना की जाएगी। आइए जानते हैं कि महाराष्ट्र से लेकर दक्षिण भारत तक गणेश पूजा और उत्सव के तरीके किस तरह अलग हैं और इन परंपराओं के पीछे क्या कारण हैं।

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महाराष्ट्र में गणेश चतुर्थी कैसे मनाई जाती है?

महाराष्ट्र में गणेश चतुर्थी कैसे मनाई जाती है?
महाराष्ट्र में गणेश चतुर्थी को गणेशोत्सव के नाम से भी जाना जाता है। यहां यह पर्व धार्मिक आयोजन के साथ-साथ सामाजिक और सांस्कृतिक उत्सव का रूप ले चुका है। घरों में गणपति की प्रतिमा स्थापित करने के अलावा जगह-जगह सार्वजनिक गणेश मंडल बनाए जाते हैं। मुंबई और पुणे जैसे शहरों में बड़े पंडाल, आकर्षक सजावट, भजन, आरती और सांस्कृतिक कार्यक्रम उत्सव का हिस्सा होते हैं। परिवार अपनी परंपरा के अनुसार गणपति को डेढ़ दिन से लेकर कई दिनों तक घर में विराजमान रखते हैं। इसके बाद प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है। विसर्जन के दौरान श्रद्धालु ढोल-ताशों और भक्ति गीतों के साथ गणपति को विदाई देते हैं।

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महाराष्ट्र में मोदक का खास महत्व - फोटो : Adobe stock

महाराष्ट्र में मोदक का खास महत्व
गणेश पूजा में भगवान गणेश को मोदक का भोग लगाने की परंपरा है। महाराष्ट्र में उकडीचे मोदक विशेष रूप से लोकप्रिय है। चावल के आटे से तैयार इस मोदक में नारियल और गुड़ की भरावन होती है। इसके अलावा गणपति पूजा के दौरान अलग-अलग परिवारों में अपनी पारंपरिक मिठाइयां और पकवान भी बनाए जाते हैं।

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कर्नाटक में गौरी पूजा के बाद गणेश उत्सव

कर्नाटक में गौरी पूजा के बाद गणेश उत्सव
कर्नाटक में गणेश चतुर्थी से जुड़ी एक प्रमुख परंपरा गौरी हब्बा है। आमतौर पर गणेश चतुर्थी से एक दिन पहले देवी गौरी की पूजा की जाती है और उसके अगले दिन भगवान गणेश की स्थापना होती है। कई परिवारों में गौरी और गणेश की पूजा को एक साथ महत्वपूर्ण माना जाता है। विशेष रूप से महिलाएं गौरी पूजा में सक्रिय रूप से भाग लेती हैं। कर्नाटक में घरों के अलावा मंदिरों और सार्वजनिक स्थानों पर भी गणेश प्रतिमाएं स्थापित की जाती हैं। बेंगलुरु समेत कई शहरों में धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन होता है।

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आंध्र प्रदेश में विनायक चविथि की परंपरा - फोटो : PTI

आंध्र प्रदेश में विनायक चविथि की परंपरा
आंध्र प्रदेश में गणेश चतुर्थी को विनायक चविथि के नाम से जाना जाता है। इस अवसर पर भगवान विनायक की पूजा घरों और मंदिरों में की जाती है। यहां गणेश पूजा में स्थानीय धार्मिक परंपराओं का प्रभाव देखने को मिलता है। कई मंदिरों में गणेश चतुर्थी के अवसर पर विशेष पूजा, अभिषेक और धार्मिक अनुष्ठान आयोजित किए जाते हैं। आंध्र प्रदेश में भगवान गणेश के प्रसिद्ध मंदिर भी हैं, जहां त्योहार के दौरान श्रद्धालुओं की विशेष भीड़ देखने को मिलती है।

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तेलंगाना में बड़े स्तर पर गणेश उत्सव - फोटो : PTI

तेलंगाना में बड़े स्तर पर गणेश उत्सव
तेलंगाना में हैदराबाद का गणेश उत्सव देशभर में अपनी अलग पहचान रखता है। यहां विशाल गणेश प्रतिमाएं और बड़े सार्वजनिक पंडाल उत्सव का प्रमुख आकर्षण होते हैं। खैरताबाद गणेश विशेष रूप से प्रसिद्ध है। गणेश प्रतिमा के दर्शन के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। विसर्जन के दिन भी शहर में बड़े स्तर पर आयोजन होते हैं। इस तरह तेलंगाना में गणेशोत्सव का सार्वजनिक स्वरूप महाराष्ट्र से मिलता-जुलता नजर आता है, लेकिन यहां की सजावट, पूजा और आयोजन में तेलंगाना की स्थानीय संस्कृति की झलक भी दिखाई देती है।

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तमिलनाडु में विनायगर चतुर्थी - फोटो : PTI

तमिलनाडु में विनायगर चतुर्थी
तमिलनाडु में गणेश चतुर्थी को विनायगर चतुर्थी कहा जाता है। भगवान गणेश को कई स्थानों पर ‘विनायगर’ और ‘पिल्लैयार’ के नाम से भी जाना जाता है। घरों और मंदिरों में गणेश प्रतिमा स्थापित कर पूजा की जाती है। पूजा सामग्री और प्रसाद में स्थानीय परंपराओं का प्रभाव देखने को मिलता है।

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तमिलनाडु में गणेश पूजा से जुड़े पारंपरिक पकवानों में कोझुकट्टई का खास स्थान है। - फोटो : Adobe stock

कोझुकट्टई का विशेष महत्व
तमिलनाडु में गणेश पूजा से जुड़े पारंपरिक पकवानों में कोझुकट्टई का खास स्थान है। यह चावल के आटे से बनाया जाने वाला पकवान है, जिसमें नारियल और गुड़ जैसी सामग्री का इस्तेमाल किया जाता है। इसे भगवान गणेश को भोग के रूप में अर्पित किया जाता है। इस तरह महाराष्ट्र के मोदक की तरह दक्षिण भारत में भी गणेश पूजा का प्रसाद स्थानीय खान-पान और संस्कृति से जुड़ जाता है।

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गणेश चतुर्थी हिंदू पंचांग के भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष चतुर्थी को मनाई जाती है। - फोटो : ANI

क्या सभी राज्यों में गणेश पूजा की तारीख एक ही होती है?
गणेश चतुर्थी हिंदू पंचांग के भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष चतुर्थी को मनाई जाती है। इसलिए अलग-अलग राज्यों में पर्व का मूल दिन समान रहता है, लेकिन पूजा का समय, स्थानीय अनुष्ठान और उत्सव की अवधि अलग हो सकती है। 2026 में गणेश चतुर्थी 14 सितंबर को मनाई जाएगी। हालांकि, स्थानीय पंचांग और शहर के अनुसार पूजा के शुभ मुहूर्त में अंतर हो सकता है।

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गणेश चतुर्थी की परंपराएं अलग क्यों हैं? - फोटो : freepik

गणेश चतुर्थी की परंपराएं अलग क्यों हैं?
भारत में धार्मिक त्योहारों का स्वरूप स्थानीय संस्कृति से गहराई से जुड़ा रहा है। अलग-अलग क्षेत्रों की भाषा, खान-पान, लोक परंपराएं, मंदिर संस्कृति और सामाजिक रीति-रिवाज त्योहारों को अपना अलग रंग देते हैं। गणेश चतुर्थी इसका बेहतरीन उदाहरण है। भगवान गणेश की पूजा का उद्देश्य हर जगह मंगल और सुख-समृद्धि की कामना करना है, लेकिन उन्हें पूजने का तरीका क्षेत्र के अनुसार बदल जाता है। यही वजह है कि महाराष्ट्र का गणेशोत्सव, कर्नाटक की गौरी-गणेश परंपरा, आंध्र प्रदेश की विनायक चविथि, तेलंगाना का विशाल गणेश उत्सव और तमिलनाडु की विनायगर चतुर्थी अपने-अपने तरीके से खास हैं।

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पूजा और उत्सव में क्या है अंतर? - फोटो : PTI

पूजा और उत्सव में क्या है अंतर?
गणेश चतुर्थी में पूजा और उत्सव दो अलग पहलू हैं। पूजा मुख्य रूप से भगवान गणेश की धार्मिक आराधना, मंत्र, आरती, भोग और अनुष्ठानों से जुड़ी होती है, जबकि उत्सव में सामूहिक आयोजन, सजावट, सांस्कृतिक कार्यक्रम, जुलूस और विसर्जन जैसी गतिविधियां शामिल होती हैं।
जहां महाराष्ट्र में घरों में गणपति की स्थापना के साथ नियमित पूजा और आरती की जाती है। इसके साथ ही सार्वजनिक गणेश मंडलों में बड़े पंडाल, भव्य सजावट, सांस्कृतिक कार्यक्रम और सामूहिक आरती आयोजित होती है। उत्सव का सबसे बड़ा आकर्षण गणपति विसर्जन रहता है।
वहीं दक्षिण भारत में भी गणेश प्रतिमा स्थापित कर पूजा, आरती और भोग अर्पित किया जाता है, लेकिन कई राज्यों में स्थानीय परंपराओं का प्रभाव अधिक दिखाई देता है। कर्नाटक में गणेश पूजा से पहले गौरी हब्बा, तमिलनाडु में विनायगर चतुर्थी और आंध्र प्रदेश में विनायक चविथि की अपनी क्षेत्रीय परंपराएं हैं। महाराष्ट्र में सार्वजनिक और भव्य आयोजन अधिक प्रमुख हैं, वहीं दक्षिण भारत के कई हिस्सों में पारिवारिक और मंदिर-केंद्रित पूजा के साथ स्थानीय रीति-रिवाजों को महत्व दिया जाता है।

डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यहां दी गई जानकारी सामान्य मान्यताओं, ज्योतिष, पंचांग, धार्मिक ग्रंथों आदि पर आधारित है। यहां दी गई सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है।

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