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देवउठनी एकादशी 2019: जानिए शालिग्राम और तुलसी विवाह की कहानी

Thu, 07 Nov 2019 10:36 AM IST
विनोद शुक्ला धर्म डेस्क, अमर उजाला
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देवउठनी एकादशी 2019
देवउठनी एकादशी में भगवान विष्णु निद्रा से जागते हैं और तुलसी माता से उनका विवाह होता है। श्री शालिग्राम और तुलसी के विवाह के बारे में आपने अक्सर सुना होगा पर आखिर कौन है ये शालिग्राम आइए जानते हैं

 
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धार्मिक शास्त्रों में भगवान शालिग्राम को श्री नारायण का साक्षात् रुप माना गया हैं। कहते है कि भगवान शालिग्राम का पूजन माता तुलसी के बिना अधूरा होता है और भगवान शालिग्राम और माता तुलसी का विवाह कराने से व्यक्ति के जीवन में सारे कलह, दुःख और रोग इत्यादि दूर हो जाते हैं। तुलसी शालिग्राम विवाह करवाने से कन्यादान के जितना ही पुण्य प्राप्त होता है। श्री शालिग्राम जी का तुलसी युक्त चरणामृत पीने से भयंकर विष का जहर भी समाप्त हो जाता है और साथ ही चरणामृत का पान करने वाला व्यक्ति समस्त पापों से मुक्त होकर परलोक चला जाता है।
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शालिग्राम की पूजा
कहते है जिस घर में भगवान शालिग्राम विराजमान हो वह घर सभी तीर्थ में से सर्वश्रेष्ठ होता है। जहां शालिग्राम का पूजन होता है वहां वास्तु दोष स्वतः ही समाप्त हो जाता है। भगवान शालिग्राम जी को स्नान कराकर और चन्दन लगाकर तुलसी अर्पित करना और फिर चरणामृत ग्रहण करने मन, धन व तन की सारी कमजोरियां दूर हो जाती हैं। घर में भगवान शालिग्राम की पूजा करने से भगवान विष्णु-लक्ष्मी बहुत प्रसन्न होते हैं। शालिग्राम शिला का जल समस्त यज्ञों और संपूर्ण तीर्थों में स्नान के समान फल देता है और जो भक्त शालिग्राम शिला के जल से अभिषेक करता है वह संपूर्ण दान के पुण्य का उत्तराधिकारी बन जाता है।

 

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शालिग्राम पत्थर की कहानी
नेपाल की गंडकी नदी में पाए जाने वाले काले रंग के अंडाकार पत्थर को शालिग्राम कहते हैं। लोग इस पत्थर को अपने घर और मन्दिर में पूजते हैं। इस पत्थर के अंदर शंख, चक्र, गदा या पद्म खुदे होते हैं।  वर्तमान में गंडकी नदी में इनकी संख्या 80 से लेकर 124 तक है। शालिग्राम एक मूल्यवान पत्थर है। शालिग्राम के भीतर अल्प मात्रा में स्वर्ण होने के कारण इसके चोरी होने का भय अधिक रहता है। 
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tulsi vivah - फोटो : file photo
तुलसी-शालिग्राम विवाह
कार्तिक में स्नान करने वाली स्त्रियां एकादशी को भगवान विष्णु के रूप शालिग्राम एवं विष्णुप्रिया तुलसी का विवाह संपन्न करवाती हैं।पूर्ण रीति-रिवाज़ से तुलसी वृक्ष से शालिग्राम के फेरे एक सुन्दर मंडप के नीचे किए जाते हैं।विवाह में कई गीत,भजन व तुलसी नामाष्टक सहित विष्णुसहस्त्रनाम के पाठ किए जाने का विधान है।शास्त्रों के अनुसार तुलसी-शालिग्राम विवाह कराने से पुण्य की प्राप्ति होती है,दांपत्य जीवन में प्रेम बना रहता है। कार्तिक मास में तुलसी रुपी दान से बढ़कर कोई दान नहीं हैं। पृथ्वी लोक में देवी तुलसी आठ नामों वृंदावनी, वृंदा, विश्वपूजिता, विश्वपावनी, पुष्पसारा, नंदिनी, कृष्णजीवनी और तुलसी नाम से प्रसिद्ध हुईं हैं। श्री हरि के भोग में तुलसी दल का होना अनिवार्य है,भगवान की माला और चरणों में तुलसी चढ़ाई जाती है।
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