आशा दशमी व्रत महाभारत काल से मनाया जाता रहा है कहते है कि आशा दशमी में भक्तों की सारी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं। आशा दशमी का व्रत इस बार 7 नवंबर को रखा जाएगा। यह व्रत हर महीने के शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को मनाया जाता है। इस व्रत का महत्त्व भगवान श्रीकृष्ण ने पार्थ को बताया था और इस व्रत को आरोग्य व्रत भी कहा जाता है क्योंकि इस व्रत के प्रभाव से शरीर निरोगी रहता है, मन शुद्ध रहता है और व्यक्ति को असाध्य रोगों से मुक्ति मिलती है।
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व्रत का महत्त्व
यह व्रत विशेष रूप से कन्याएं एक अच्छे वर की तलाश में रखती हैं। पति के यात्रा पर जाने और लौट कर न आने की स्थिति में इस व्रत के द्वारा पत्नियां अपने पति को शीघ्र प्राप्त कर सकती है। शिशु की दंत जनिक पीड़ा भी इस व्रत के प्रभाव से दूर हो जाती है। आशा दशमी के व्रत के दौरान इन 10 बातों का ध्यान रखना चाहिए..
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- फोटो : social media
आशा दशमी व्रत में प्रात:काल के समय ही स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। इसके बाद व्रत रखकर देवताओं की पूजा करें।
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रात्रि में पुष्प रोली चंदन आदि से दस आशा देवियों की पूजा करें और प्रसाद ग्रहण करें।
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दसों दिशाओं में घी के दीपक जलाकर धूप, दीप, नैवेद्य, फल आदि आशा देवियों को समर्पित करें।
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व्रत की पूजा में अपने कार्य की सिद्धि के लिए प्रार्थना करें और जब तक मनोकामना पूर्ण न हो तब तक इस व्रत को अवश्य करें।
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आशा दशमी व्रत की पूजा विधि के साथ उद्यापन विधि का भी ज्ञान होना आवश्यक है इसके लिए उद्यापन में आशादेवियों की सोने, चांदी अथवा मिट्टी से प्रतिमा बना लें।
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ऐन्द्री, आग्रेयी, याम्या, नैऋति, वारुणी, वाल्व्या, सौम्या, ऐशनी, अध्: तथा ब्राह्मी इन दस आशा देवियों से कामनाओं की सिद्धि के लिये प्रार्थना करें।
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इस व्रत को हर छह मास, एक वर्ष या दो वर्ष के लिए करना चाहिए।
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व्रती को अपने आंगन में दसों दिशाओं की पूजा करनी चाहिए।
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दसों दिशाओं में घी के दीपक जलाकर धूप दीप और फल आदि समर्पित करना चाहिए।
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Guru Purnima 2019
- फोटो : Rohit Jha
ब्राह्मण को दक्षिणा देकर प्रसाद ग्रहण कराना चाहिए।
आशाश्रचशा: सदा सन्तु सिद्धय्नताम मे मनोरथा:
भवतिनाम प्रसादेन सदा कल्याणमसित्व्ती
हे ! आशा देवियों,
मेरी आशाएं सदा सफल हों, मेरे मनोरथ पूर्ण हों, आपके अनुग्रह से मेरा सदा कल्याण हो।