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होली का पहला संबंध सत्य से है... इसे उत्सव की तरह मनाएं, नशा और मांसाहार से नहीं: आचार्य प्रशांत:

Tue, 03 Mar 2026 04:52 PM IST
Jyoti Mehra आचार्य प्रशांत

सार

Acharya Prashant on holi 2026: आचार्य प्रशांत ने भगवद्गीता सत्र को संबोधित करते हुए होली पर्व के बारे में जरूरी संदेश दिए। उन्होंने कहा होली का अर्थ है सृजनात्मकता, विवेक, और साहस। यह दिन छूट का नहीं, स्मरण का है। यह दिन बेहोशी का नहीं, जागरण का दिन है। होली का पहला संबंध सत्य से है, बाकी सब संबंध बाद में आते हैं। आइए विस्तार से जानते हैं।
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“भीतर की विकृति के दहन की जगह बाहर का धुआं क्यों?'' आचार्य प्रशांत - फोटो : Amar Ujala
Acharya Prashant on Holi: प्रशांत अद्वैत फाउंडेशन के संस्थापक विचारक दार्शनिक आचार्य प्रशांत ने भगवद्गीता सत्र को संबोधित करते हुए कहा है कि होली परंपरागत रूप से रंगों का पर्व कहलाती है। लोग मिलते हैं, हंसते हैं, पुराने गिले मिटाते हैं, और जीवन में थोड़ा हल्कापन आता है। यह सब सुंदर है। उत्सव जीवन का विरोध नहीं है। लेकिन होली के साथ जो एक दूसरी चीज लगातार जुड़ती जा रही है, वह चिंताजनक है। रंगों की आड़ में बदतमीजी, “मस्ती” के नाम पर अभद्रता और नशे की बेहिसाब छूट, और परंपरा के नाम पर ऐसी हरकतें जिनका परंपरा से कोई रिश्ता ही नहीं। महिलाएं असुरक्षित महसूस करें, सार्वजनिक स्थान अराजक हो जाएँ, किसी के घर की चीज़ें उठाकर दहन में डाल दी जाएँ, कहीं जानवर काटे जाएँ, और फिर कहा जाए, “बुरा न मानो, होली है,” तो प्रश्न उठेगा। प्रश्न यह नहीं कि होली मनाई जाए या नहीं। प्रश्न यह है कि हम होली के नाम पर क्या मना रहे हैं।

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हर साल होलिका दहन होता है। हर साल प्रतीक जलता है, फिर भी हमारी विकृतियां घटती क्यों नहीं? - फोटो : adobe stock
उन्होंने कहा कि हर साल होलिका दहन होता है। हर साल प्रतीक जलता है, फिर भी हमारी विकृतियां घटती क्यों नहीं? जो जलना था, वह बच कैसे जाता है? और जो जल गया था, वह बार-बार लौट कैसे आता है? कथा में एक पात्र है, हिरण्यकश्यप। हम उसे अक्सर किसी पुराने समय का “असुर राजा” समझ लेते हैं। पर वह केवल राजा नहीं है, वह एक मानसिकता है। “हिरण्य” का अर्थ है सोना, चमक, सुविधा का आकर्षण। “कशिपु” का अर्थ है शैया, आराम। यानी वह जो जीवन को सुरक्षा, सुविधा और स्वर्ण की शैया पर टिकाना चाहता है। यह वही आग्रह है जो भीतर बैठकर कहता रहता है “मुझे कुछ न हो। मेरा नियंत्रण बना रहे। मेरी प्रतिष्ठा बनी रहे। मेरी व्यवस्था बनी रहे।” यह आग्रह, यही केन्द्र, यही ‘मैं’, यही अहंकार है। 

कथा में यह भी संकेत है कि हिरण्यकश्यप ऋषि-वंश से है। यानी समस्या बाहर से नहीं आती, समस्या वहीं से भी निकल आती है जहां से ज्ञान निकला था। जब ज्ञान का उपयोग आत्म-शुद्धि के लिए नहीं, आत्मरक्षा के लिए हो, तो वही ज्ञान अहंकार का हथियार बन जाता है। एक भ्रम यह भी है कि अहंकार आलसी होता है। नहीं। अहंकार बहुत अनुशासित हो सकता है। हिरण्यकश्यप ने तप किया। रावण ने तप किया। कई दानवी चरित्रों को भी वरदान मिले। तो प्रश्न तपस्या का नहीं, प्रश्न उद्देश्य का है। अनुशासन किसलिए? मेहनत किसलिए? सच्चाई के लिए या अपने झूठ को “अमर” करने के लिए?
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अहंकार की एक विचित्र क्षमता है। वह अपने ही किसी हिस्से को देवता बना देता है और बाकी हिस्सा उसे पूजने लगता है। - फोटो : adobe stock
अहंकार क्या है?
उन्होंने कहा कि हिरण्यकश्यप ने वरदान मांगा कि दिन में नहीं मरूंगा, रात में नहीं, भीतर नहीं, बाहर नहीं, अस्त्र से नहीं, शस्त्र से नहीं, नर से नहीं, पशु से नहीं। ये सारी शर्तें एक ही बात कहती हैं, “मैं द्वैत की हर सीमा पर बचा रहूं।” क्योंकि अहंकार की असली शरण द्वैत है। “मैं-तुम”, “अपना-पराया”, “दिन-रात”, “भीतर-बाहर”, इन्हीं दरारों में वह छुपता है। जहां दो हैं, वहां वह बच जाता है। झूठ भीतर से जानता है कि वह झूठ है। इसलिए अहंकार को भरोसा नहीं आता। भरोसा न आए तो वह घोषणा करवाता है, “मेरी पूजा होगी।” यह अहंकार की एक विचित्र क्षमता है। वह अपने ही किसी हिस्से को देवता बना देता है, और बाकी हिस्सा उसे पूजने लगता है। या फिर सीधे खुद ही ईश्वर होने का दावा कर देता है, ताकि भीतर का डर ढका रहे। लेकिन भीतर डर बना रहता है।

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सच के सामने कोई रिश्ता बड़ा नहीं - फोटो : amar ujala
सच के सामने कोई रिश्ता बड़ा नहीं
आचार्य प्रशांत ने बताया कि तभी एक छोटी-सी बात घटती है जो पूरे साम्राज्य को हिला देती है। प्रह्लाद कोई राजनीतिक विद्रोही नहीं है। वह भीतर की वह निर्मल असहमति है जो कहती है: “नहीं। झूठ चाहे जितना शक्तिशाली हो, मैं उसका साथ नहीं दूंगा।” यह बात और भी तीखी इसलिए है क्योंकि हिरण्यकश्यप केवल राजा नहीं, पिता भी है। यानी कथा कहती है, सच के सामने कोई रिश्ता बड़ा नहीं। सच के सामने कोई सत्ता बड़ी नहीं। जो व्यक्ति कह देता है, “आप राजा हों, आप पिता हों, मैं सत्य छोड़कर आपके साथ नहीं जाऊंगा,” वही प्रह्लाद है। प्रह्लाद बाहर से नहीं आया। वह उसी घर में पैदा हुआ। मुक्ति की आकांक्षा बंधन के भीतर से उठती है। जहां घुटन गहरी होती है, वहीं से सबसे तेज पुकार उठती है। 
 
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विवेक की आग में होलिका भस्म - फोटो : adobe stock
विवेक की आग में होलिका भस्म
फिर होलिका आती है। वह केवल एक “बहन” नहीं है। वह वह व्यवस्था है जो सच को दबाना जानती है, कभी प्यार से, कभी डर से, कभी चुपचाप “दुर्घटना” बनाकर। उन्होंने बताया कि कथा में कहा जाता है कि होलिका के पास एक ऐसा आवरण था जो उसे आग से बचाता था। उसने सोचा, बालक को गोद में ले जाकर आग में बैठ जाऊं, मैं बच जाऊंगी, वह जल जाएगा। लेकिन यहां आग साधारण आग नहीं है। यह विवेक की आग है। विवेक वही है जो जानता है क्या जलना चाहिए और क्या बचना चाहिए। इसलिए प्रह्लाद बचता है, होलिका जलती है। और यहीं से होली का मर्म सामने आता है। यह उत्सव उस दिन का नाम है जब सच के आगे झुकना चुना गया, और झूठ के आगे झुकने से इनकार किया गया। 
 
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होली का नशे और हिंसा से क्या संबंध है? - फोटो : Adobe
होली का नशे और हिंसा से क्या संबंध है?
आज होली के नाम पर जो होता है, उसमें प्रह्लाद कहां है? कहां है वह सरलता, वह निर्दोषता, वह साहस? इसके बदले कई जगहों पर क्या दिखता है? नशा, मांस, उन्माद, महिलाओं पर पानी के गुब्बारे, सड़कों पर अराजकता, और “त्योहार” की आड़ में खुली छूट। तो सवाल सीधा है, इस पर्व का नशे और हिंसा से क्या संबंध है? इस कथा में “चिकन और दारू” कहां लिखा है? यह पर्व तो बताता है कि अहंकार कितना भी चालाक हो, सच्चाई उसे काट देगी। यह पर्व तो बताता है कि निर्दोषता की जीत होती है, चालाकी की नहीं। फिर हम किस तरह का उत्सव मना रहे हैं? हम हर वर्ष बड़े पैमाने पर दहन करते हैं, लकड़ी जलाते हैं, सार्वजनिक जगहों पर अव्यवस्था करते हैं, धुएं में हवा को भरते हैं। यह सब किसलिए? यदि त्योहार का अर्थ “भीतर की विकृति का दहन” है, तो “बाहर का धुआं” क्यों? 
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महावतार नरसिम्हा (प्रतीकात्मक तस्वीर) - फोटो : एक्स
सत्य के आगे नहीं टिकता अहंकार
आज हम उपभोग की एक वैश्विक संस्कृति में जी रहे हैं, जहां हर अवसर बाजार बन जाता है। त्योहार भी “इवेंट” बन जाते हैं और इवेंट का नियम है, ज्यादा खर्च, ज्यादा उपभोग, ज्यादा शोर। यह वही मानसिकता है जो जंगल काटती है, जीवाश्म ईंधन जलाती है, पृथ्वी को संसाधन-भंडार मानती है। भीतर की असुरक्षा बाहर की लूट बन जाती है। जब चेतना नहीं उठती, तो उपभोग बढ़ता है। और जब उपभोग बढ़ता है, तो प्रकृति जलती है। यह भी “हिरण्यकश्यप” ही है, स्वर्ण और सुरक्षा का लालच, जो हर सीमा पर अपना कवच चाहता है, चाहे धरती की कीमत पर ही क्यों न हो। हिरण्यकश्यप ने जिस खंभे को जड़ समझा, उसी से नरसिंह प्रकट हुए। यानी सत्य वहीं से आता है जहां अहंकार को उम्मीद नहीं होती और फिर उसकी सारी शर्तें निष्फल हो जाती हैं। न दिन, न रात, न भीतर, न बाहर, न अस्त्र, न शस्त्र, न धरती, न आकाश। यह संकेत है कि अहंकार का सबसे बड़ा “सुरक्षा-चक्र” भी टूट सकता है। सत्य किसी भी द्वैत को अंतिम नहीं मानता।
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होली का अर्थ है, सृजनात्मकता - फोटो : Adobe stock
होली का अर्थ है, सृजनात्मकता
आचार्य प्रशांत ने कहा कि होली छोड़ने की बात नहीं है। होली को ऊंचा करने की बात है। यदि कोई व्यक्ति अंडा फेंकने की प्रथा शुरू कर सकता है, तो कोई व्यक्ति बोध से जनित कोई अच्छी प्रथा भी शुरू कर सकता है। होली का अर्थ है, सृजनात्मकता, विवेक, और साहस। रंग खेलिए, मिलिए। पर याद रखिए, यह दिन छूट का नहीं, स्मरण का दिन है। यह दिन बेहोशी का नहीं, जागरण का दिन है और सबसे जरूरी बात, होली का पहला संबंध सत्य से है। बाकी सब संबंध बाद में आते हैं। 

कबीर साहब कहते हैं, “मन के बहुतक रंग हैं, पल-पल बदले सोय, एक रंग में जो रहे, ऐसा बिरला कोय।”
बाहर के रंग सुंदर हैं। पर भीतर उस “एक-रंगी” सत्य का स्मरण रहे, जिसके सामने ही सिर झुकना चाहिए।


आचार्य प्रशांत

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