महावतार नरसिम्हा (प्रतीकात्मक तस्वीर)
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सत्य के आगे नहीं टिकता अहंकार
आज हम उपभोग की एक वैश्विक संस्कृति में जी रहे हैं, जहां हर अवसर बाजार बन जाता है। त्योहार भी “इवेंट” बन जाते हैं और इवेंट का नियम है, ज्यादा खर्च, ज्यादा उपभोग, ज्यादा शोर। यह वही मानसिकता है जो जंगल काटती है, जीवाश्म ईंधन जलाती है, पृथ्वी को संसाधन-भंडार मानती है। भीतर की असुरक्षा बाहर की लूट बन जाती है। जब चेतना नहीं उठती, तो उपभोग बढ़ता है। और जब उपभोग बढ़ता है, तो प्रकृति जलती है। यह भी “हिरण्यकश्यप” ही है, स्वर्ण और सुरक्षा का लालच, जो हर सीमा पर अपना कवच चाहता है, चाहे धरती की कीमत पर ही क्यों न हो। हिरण्यकश्यप ने जिस खंभे को जड़ समझा, उसी से नरसिंह प्रकट हुए। यानी सत्य वहीं से आता है जहां अहंकार को उम्मीद नहीं होती और फिर उसकी सारी शर्तें निष्फल हो जाती हैं। न दिन, न रात, न भीतर, न बाहर, न अस्त्र, न शस्त्र, न धरती, न आकाश। यह संकेत है कि अहंकार का सबसे बड़ा “सुरक्षा-चक्र” भी टूट सकता है। सत्य किसी भी द्वैत को अंतिम नहीं मानता।