ससुराल पक्ष ने विधवा बहू का पूरे रीति-रिवाज के साथ पुनर्विवाह करवा मिसाल पेश की है। दुर्भाग्यवश तीन साल पहले उनके बड़े बेटे सुरजीत कुमार की मौत सड़क दुर्घटना में हो गई। इसके बाद बहू रेणु बाला ससुराल में सहम सी गई थी। बहू की स्थिति को देखते हुए ससुराल पक्ष ने छोटे बेटे से विधवा बहू की धूमधाम से शादी करवा ऐसी मिसाल पेश की जो लोगों के लिए प्रेरणा बन गई।
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हिमाचल के जिला ऊना मुख्यालय के साथ लगते रक्कड़ में इस तरह की अनूठी शादी को देख हर कोई वर पक्ष की सराहना कर रहा था। हरोली विधानसभा के बट्ट कलां (बाथू) गांव के मदन लाल और उनके छोटे बेटे सुनील कुमार की हर कोई प्रशंसा कर रहा था।
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अकसर सरकारें विधवा विवाह को प्रोत्साहित करने के लिए अनेकों दावे करती हैं, लेकिन ये दावे जमीनी हकीकत पर कम और कागजों पर अधिक मजबूत होते हैं।
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विधवा बहू के पुनर्विवाह को लेकर हिमाचल जैसे राज्य में महिलाओं की स्थिति ज्यादा बेहतर नहीं है। लंबे समय से ऐसी परिस्थिति में अकेली रह गई महिलाओं की हालत समाज में उपेक्षित ही रही है।
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लेकिन, मदन लाल और उनके परिवार ने एक साहसिक कदम उठाते हुए अपने बड़े बेटे सुरजीत की मौत के करीब सवा साल बाद न सिर्फ अपनी बहू का पुनर्विवाह अपने छोटे बेटे के साथ किया, बल्कि उन्होंने समाज को बेटियों और बहुओं के प्रति दृष्टिकोण बदलने और विधवा विवाह को बढ़ावा देने के लिए भी प्रेरित किया है।
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यह शादी समाज को एक नया संदेश दे गई। इस पुनर्विवाह से पहले बहू रेणु को बाकायदा उसके मायके ऊना विधान सभा के रक्कड़ गांव भेजा गया।
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और फिर गाजे-बाजे के साथ अपने छोटे बेटे सुनील कुमार की बारात लेकर रक्कड़ पहुंचे और सामाजिक एवं धार्मिक रीति रिवाजों के साथ अपनी बहू को घर लाए।
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रेणु की सुरजीत से एक दो साल की बिटिया भी है। रेणु के ससुर मदन लाल का कहना है कि बेटी और बहू में कोई फर्क नहीं।
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भाग्यवश इस तरह की स्थिति किसी भी बेटी के साथ आ सकती है। ऐसे में हमें बच्चों की सहमति से रूढ़िवाद को तोड़कर आगे बढ़ना चाहिए।