इस सागर से हर साल बाहर निकलते हैं देवता, दर्शनों को उमड़ता है सैलाब
Fri, 05 Aug 2016 03:30 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, शिमला
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पिछले करीब 56 सालों से यहां देवता हर साल सागर से बाहर निकलकर अपने भक्तों को दर्शन देते हैं। इन दुर्लभ दर्शनों के लिए हर साल यहां भक्तों का सैलाब भी उमड़ता है। जानिए कैसे सागर में डूबा यह आस्था का शहर। जानिए पूरी कहानी..
पिछले करीब 56 सालों से यहां देवता हर साल सागर से बाहर निकलकर अपने भक्तों को दर्शन देते हैं। इन दुर्लभ दर्शनों के लिए हर साल यहां भक्तों का सैलाब भी उमड़ता है। जानिए कैसे सागर में डूबा यह आस्था का शहर। जानिए पूरी कहानी..
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देवभूमि हिमाचल के शहर बिलासपुर की गोबिंद सागर झील में समा चुके ये ऐतिहासिक मंदिर हर साल जल मग्न ही रहते हैं। मगर गर्मियों के बीच में एक समय ऐसा भी आता है जब अचानक पानी का जलस्तर कम हो जाता है और ये मंदिर सामने आ जाते हैं।
- फोटो : अमर उजाला
देवभूमि हिमाचल के शहर बिलासपुर की गोबिंद सागर झील में समा चुके ये ऐतिहासिक मंदिर हर साल जल मग्न ही रहते हैं। मगर गर्मियों के बीच में एक समय ऐसा भी आता है जब अचानक पानी का जलस्तर कम हो जाता है और ये मंदिर सामने आ जाते हैं।
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जानकारी के अनुसार बेहद ही नायाब नक्काशी से बनाए गए रंगनाथ मंदिर, गोपाल मंदिर, मुरली मनोहर मंदिर, बाह का ठाकुरद्वारा, खनमुखेश्वर, रघुनाथ मंदिर और रंग महल पूरी तरह से जलमग्न हो गए हैं।
जानकारी के अनुसार बेहद ही नायाब नक्काशी से बनाए गए रंगनाथ मंदिर, गोपाल मंदिर, मुरली मनोहर मंदिर, बाह का ठाकुरद्वारा, खनमुखेश्वर, रघुनाथ मंदिर और रंग महल पूरी तरह से जलमग्न हो गए हैं।
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1960 में भाखड़ा बांध बनने से पहले इन मंदिरों का अपना ही महत्व था। कहा जाता है कि उत्तर भारत में इस तरह के ये सबसे अलग ही मंदिर है।
1960 में भाखड़ा बांध बनने से पहले इन मंदिरों का अपना ही महत्व था। कहा जाता है कि उत्तर भारत में इस तरह के ये सबसे अलग ही मंदिर है।
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कहते हैं कि बिलासपुर के पुराने शहर रत्नपुर में ऋषियों मुनियों ने तपस्या की थी। इसी दौरान उन्होंने इन मंदिरों का निर्माण किया। मगर अब ऐतिहासिक महत्व के इन मंदिरों को बचाने के लिए सरकार ने आंखे मूंद ली है।
कहते हैं कि बिलासपुर के पुराने शहर रत्नपुर में ऋषियों मुनियों ने तपस्या की थी। इसी दौरान उन्होंने इन मंदिरों का निर्माण किया। मगर अब ऐतिहासिक महत्व के इन मंदिरों को बचाने के लिए सरकार ने आंखे मूंद ली है।
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अब इन मंदिरों की कहानियां लोक गायकों, कवियों और साहित्यकारों की रचनाओं तक ही सिमट कर रह गई हैं। कई मंदिर तो गर्मियों में झील का जल स्तर घटने पर पानी से बाहर आ जाते हैं। मगर करीब एक दर्जन मंदिर पानी में पूरी तरह से समा चुके हैं।
- फोटो : अमर उजाला
अब इन मंदिरों की कहानियां लोक गायकों, कवियों और साहित्यकारों की रचनाओं तक ही सिमट कर रह गई हैं। कई मंदिर तो गर्मियों में झील का जल स्तर घटने पर पानी से बाहर आ जाते हैं। मगर करीब एक दर्जन मंदिर पानी में पूरी तरह से समा चुके हैं।
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देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू महत्वाकांक्षी परियोजना भाखड़ा बांध का उद्घाटन किया था तो उस समय में आश्वासन दिया गया था कि शहर की धरोहर को बचाने के लिए हर संभव प्रयास किया जाएगा। मगर धरातल पर आज तक कुछ नहीं हुआ।
- फोटो : अमर उजाला
देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू महत्वाकांक्षी परियोजना भाखड़ा बांध का उद्घाटन किया था तो उस समय में आश्वासन दिया गया था कि शहर की धरोहर को बचाने के लिए हर संभव प्रयास किया जाएगा। मगर धरातल पर आज तक कुछ नहीं हुआ।
9वीं शताब्दी में बने इन मंदिरों में पर की नक्काशी भी काफी मनमोहक है। शायद अब ऐसे मंदिरों का निर्माण हो सकता है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने यहां के 12 मंदिरों को राष्ट्रीय महत्व का घोषित किया है और इनके रिलोकेशन का फैसला लिया है।
9वीं शताब्दी में बने इन मंदिरों में पर की नक्काशी भी काफी मनमोहक है। शायद अब ऐसे मंदिरों का निर्माण हो सकता है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने यहां के 12 मंदिरों को राष्ट्रीय महत्व का घोषित किया है और इनके रिलोकेशन का फैसला लिया है।