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महाकाली से हुआ था एक बड़ा 'महापाप', यहां पर मिली थी मुक्ति

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देवी योगमाया ने असुरों का नाश करने के लिए महाकाली का रूप धारण किया और उनका संहार कर डाला। मगर क्रोध में महाकाली से ऐसा महापाप हुआ जिससे मुक्ति पाने के लिए वह वर्षों भटकती रहीं। जानिए कैसे और कहां मिली उन्हें मुक्ति..
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महाकाली से हुआ था एक बड़ा 'महापाप', यहां पर मिली थी मुक्ति

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महाकाली का भयंकर रूप धारण करने के बाद जब मां ने राक्षसों का नाश किया तो इसके बाद भी उनका क्रोध शांत नहीं हुआ। इसी क्रोध में उन्होंने भगवान शिव पर पांव रख दिया था। इस महापाप के कारण ही उन्हें वर्षों तक हिमालय में प्रायश्चित के लिए भटकना पड़ा था। यह वही स्‍थान हैं जहां पर महाकाली को अपने इस महापाप से मुक्ति मिली थी।
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महाकाली से हुआ था एक बड़ा 'महापाप', यहां पर मिली थी मुक्ति

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बात सतयुग की है जब भगवान शिव से वरदान प्राप्त करके राक्षस इतने बलवान हो गए कि उनके पापों से धरती कांप उठी। भगवान शिव के कहने पर योगमाया ने महाकाली का भयंकर रूप धारण किया और असुरों का सर्वनाश कर दिया। उनका क्रोध शांत करने के लिए भगवान शिव ने असुर का रूप धारण किया और दोनों में इतना भयंकर युद्ध हुआ कि देवतागण भी भयभीत हो गए।

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भगवान शिव ने जब उन्हें चिंतित देखा तो इसका एक उपाय निकाला। वह खुद धरती पर लेट गए। महाकाली ने जैसे ही राक्षस समझकर उन पर प्रहार किया तो उन्हें शंकरजी का रूप स्पष्ट दिखाई पड़ा और उनका क्रोध शांत हो गया।
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मगर खुद से हुए पाप का प्रायश्चित तो उन्हें करना ही था, तो वह हजारों वर्षों तक हिमालयी में भटकती रही। मान्यता है कि इसी स्‍थान पर ब्यास नदी के किनारे जब महाकाली ने भगवान शिव का ध्यान किया तो आखिरकार भगवान शंकर ने उन्हें दर्शन दिए और इस तरह से मां महाकाली को भूलवश हुए अपने महापाप से मुक्ति मिली। उसी समय यहां ज्योतिलिंग की स्‍थापना हुई। तभी से इस मंदिर का नाम श्री कालीनाथ महाकालेश्‍वर महादेव मंदिर पड़ा।
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देवभूमि हिमाचल के कांगड़ा परागपुर में स्थित यह वही स्‍थान है जहां पर महाकाली को भगवान शिव ने वर्षों बाद महापाप से मुक्ति दी थी। इसी वजह से इस मंदिर का नाम श्री कालीनाथ कालेश्वर शिव मंदिर पड़ा। ब्यास नदी के किनारे स्थित यह मंदिर भक्तों के लिए हमेशा से ही श्रद्धा का केंद्र रहा है।
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ब्यास नदी के किनारे यह वही स्‍थान हैं जहां पर हजारों वर्षों तक हिमायल में प्रायश्चित करने के बाद महाकाली ने भगवान शिव को याद किया और भोलेनाथ ने उन्हें दर्शन देकर महापाप से मुक्ति मिली। मान्यता है कि उसी समय यहां शिवलिंग की स्‍थापना हुई। सतयुग से लेकर आज तक इस शिवलिंग की लोग श्रद्धाभाव से पूजा करते हैं।

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हिमाचल के कांगड़ा देहरा के परागपुर गांव में स्थित यह मंदिर ब्यास नदी के किनारे स्थित है और यहां पर महाशिवरात्रि पर भव्य समारोह का आयोजन होता है।

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ब्यास नदी के किनारे स्थित श्री कालीनाथ महाकालेश्वर महादेव मंदिर के स्‍थान पर शमाशानघाट भी स्थित हैं, जहां पर हिंदू धर्म के लोगों अंतिम संस्कार की प्रक्रिया पूरी की जाती है। हिंदुओं का विश्वास है कि शमशानघाट में भगवान शिव का वास होता है।



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मंदिर आने के लिए श्रद्धालुओं को दिल्ली से अंबाला 200 किलोमीटर का सफर तय करने के बाद अंबला से ऊना 175 किलोमीटर और ऊना से कालेश्वर मंदिर कांगड़ा तक 75 किलोमीटर का सफर तय करना पड़ता है।

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श्री कालीनाथ महाकालेश्‍वर महादेव मंदिर में स्‍थापित शिवलिंग भी अपने आप में अनोखा है। माना जाता है कि शिवलिंग में महाकाली का वास भी है।
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