हिमाचल प्रदेश के चंबा जिला के भरमौर में स्थित मणिमहेश को भगवान शिव और मां पार्वती का निवास स्थान माना जाता है। हर वर्ष जन्माष्टमी से यह मणिमहेश यात्रा शुरू होती है। राधाष्टमी के दिन पवित्र डल झील में स्नान के बाद इस यात्रा का समापन होता है। इनपुट: अमर उजाला ब्यूरो, भरमौर (चंबा)
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'महादेव की इस झील में बलि नहीं हुई तो डूबने से होंगी मौतें'
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मणिमहेश के शिव चेलों ने यह घोषणा कर दी है कि अगर इस साल डल झील में बलि नहीं दी गई तो इस झील में डूबने से लोगों की मौतें हो सकती हैं।
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इसी प्रकार का एक मामला पिछले वर्ष 2014 में भी सामने आ चुका है। जब जम्मू-कश्मीर से आए एक यात्री ने बलि देने से पहले डल झील में स्नान करने की कोशिश की थी।
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इसके बाद यह श्रद्घालु डूबा और सात दिन बाद इस श्रद्घालु का शव डल झील की गहराई से बाहर निकला था। ऐसे में न्यायालय का निर्णय भी लोगों को काल के गर्त में जाने से नहीं बचा सकता है।
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मणिमहेश के शिव चेलों में से धर्म सिंह, चमन सिंह, विजय कुमार, जगदीश चंद, प्यार सिंह सहित लगभग डेढ़ सौ शिव चेलों ने मणिमहेश डल झील में बलि देना आवश्यक बताया है।
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इसी संबंध में शिव चेलों का एक प्रतिनिधिमंडल भरमौर प्रशासन को ज्ञापन सौंपने की तैयारी कर रहा है ताकि यात्रा के दौरान यात्रियों की जान बचाई जा सके।
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इस बार मणिमहेश डल झील में पवित्र स्नान का समय बीस सितंबर को सप्तमी तिथि पर शुरू होगा।
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इसी समय शिव अनुयायी मेढ़े की बलि को चढ़ाकर डल झील में शाही स्नान की शुरूआत करते हैं। इसके बाद अष्टमी तिथि लगने पर आम लोगों के लिए शाही स्नान शुरू होता है। ऐसे में बलि न देने का निर्णय आस्था पर भारी पड़ सकता है।
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हालांकि रिवाज के अनुसार नारियल की बलि देकर भी इस प्रथा को कायम रखा जा सकता है लेकिन लोगों की सुरक्षा को देखते हुए शिव चेले इस पक्ष में एक मत नहीं हो पा रहे हैं।
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एसडीएम भरमौर जितेंद्र कंवर ने बताया कि सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय अनुसार किसी भी धार्मिक स्थान में बलि देना गैर कानूनी है। मणिमहेश यात्रा के दौरान पुलिस व्यवस्था पर नजर रखेगी। अगर कोई बलि देते पाया गया तो कड़ी कार्रवाई की जाएगी।