भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) लिखने वाले लॉर्ड मैकाले यानी थॉमस बैबिंगटन मैकाले की पुस्तकों को हिमाचल के राज्य पुस्तकालय में दीमक चाट रहा है। 165 साल पहले उनकी लंदन में छपी मशहूर पुस्तक ‘द हिस्ट्री ऑफ इंग्लैंड’ के सभी वॉल्यूम शिमला में उपलब्ध हैं। यहां आज तक इन किताबों को न तो ढंग से सहेजा गया और न ही इनके लिए कोई पाठक मिला। भारत में अपनी शिक्षा पद्धति थोपने या अपने बेबाक खुले पत्रों के लिए मशहूर रहे लॉर्ड मैकाले की लिखी इन किताबों के यहां कद्रदान न होने की बात चौंका देती है।
विज्ञापन
2 of 6
मैकाले की तरह ही कई ब्रिट्रिश और भारतीय लेखकों की लंदन या अन्य देशों पर छपी पुस्तकों के भी यही हाल हैं। इन्हें या तो दीमक चट कर रहा है या फिर ये धूल या फंगस से सड़ रही हैं। इनमें कुछ किताबें तो 200 साल पुरानी भी हैं। अंग्रेजों के जमाने में बने गांधी भवन शिमला में स्टेट लाइब्रेरी है। इसमें सन् 1800 से लेकर आजादी तक की करीब 28 हजार पुरानी किताबें हैं। कई किताबें तो एक बार भी इश्यू नहीं हुई हैं। पंडित नेहरू की उर्दू में लिखी किताब ‘कुछ पुराने खत’ भी एक कोने में पड़ी है।
विज्ञापन
3 of 6
इसे तीन दशक से कोई पाठक नहीं मिला है। अंग्रेजों ने शिमला को राजधानी बनाया था तो उसी दौरान उन्होंने लंदन या विदेशों के अन्य हिस्सों में छपी किताबें यहां मंगवाईं। यहां अंग्रेजी की 19 हजार, हिंदी की 6807, उर्दू की 1750 और पंजाबी की 443 पुस्तकें हैं। भारत के आजाद होने केबाद वे इन पुस्तकों को यहीं छोड़कर चले गए। अब इनकी अनदेखी हो रही है।
4 of 6
pic shimla
ब्रिटिश संसद को लिखा पत्र, यहां न भिखारी-न चोर
स्टेट लाइब्रेरी में अंग्रेजी की किताबें -19 हजार, हिंदी की किताबें - 6807, उर्दू की किताबें - 1750 . पंजाबी की किताबें - 443।लार्ड मैकाले ने 1835 में ब्रिटिश संसद को पत्र लिखा था, जिसके अंश हैं - मैं भारत के कोने - कोने में घूमा हूं। मुझे एक भी ऐसा व्यक्ति नहीं दिखाई दिया जो भिखारी हो, चोर हो। इस देश में मैंने इतनी धन दौलत देखी, इतने ऊंचे चारित्रिक आदर्श गुणवान मनुष्य देखे हैं कि मैं नहीं समझता हम इस देश को जीत पाएंगे, जब तक इसकी रीढ़ की हड्डी को नहीं तोड़ देते।
विज्ञापन
5 of 6
शक्ल से भारतीय, अक्ल से अंग्रेज बना दूंगा
1834 में भारत भ्रमण पर लार्ड मैकाले ने कहा था कि मैं भारत की शिक्षा व्यवस्था को ऐसा बना दूंगा कि इसमें पढ़कर निकलने वाला व्यक्ति शक्ल से भारतीय और अक्ल से पूरा अंग्रेज होगा। भारत में भ्रष्टाचार बिल्कुल भी नहीं है, यहां पर चोरियां नहीं होती हैं।
पुस्तकालय में इन अंग्रेजों की पुस्तकें
इस पुस्तकालय में 1854 में छपी ओस्टन हेनरी लॉर्ड की ओर से लिखित पुस्तक नीनवे, 1889 की छपी जेबी प्रिस्टली की मिडनाइट ऑन द डेजर्ट, 1852 की प्रकाशित हिस्ट्री ऑफ फेडरिक ऑफ पर्शिया, 1858 में एचई कार्डिनल वाइसमेन की द लॉस्ट फॉर पोपस रोमन देयर, 1860 की हेनरी हालम की द स्टेट ऑफ यूरोप, सर विलियम विलसन की ए हिस्टरी ऑफ ब्रिटिश इंडिया आदि के अलावा कई अन्य पुस्तकें मौजूद हैं।