अंतरराष्ट्रीय मिंजर मेला भगवान रघुनाथ व लक्ष्मीनाथ को मिंजर अर्पित करने के साथ शुरू हो गया। मिर्जा परिवार के मुखिया ऐजाज मिर्जा ने अपने हाथों से बनाई मिंजर भगवान को अर्पित की। फोटो : प्रवीन कुमार
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PICS : 373 साल की परंपरा के साथ मिंजर मेला शुरू
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मुख्यातिथि सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्री डा. धनीराम शांडिल ने चौगान नंबर एक में ध्वजारोहण करके मेले का विविधत शुभारंभ किया। इसके बाद कुंजड़ी मल्हार से माहौल संगीतमय हो गया। फोटो : प्रवीन कुमार
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इस मौके पर वन मंत्री ठाकुर सिंह भरमौरी भी मौजूद रहे। डा. शांडिल ने कहा कि चंबा की पुरातन समृद्ध लोक संस्कृति का कोई सानी नहीं है। चंबा का गीत संगीत भी अद्भुत है। मेला 27 जुलाई से तीन अगस्त तक चलेगा। फोटो : प्रवीन कुमार
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यह परंपरा वर्ष 1641 में चंबा के राजा पृथ्वी सिंह के जमाने में उस समय शुरू हुई, जब दिल्ली के बादशाह शाहजहां थे। बताया जाता है कि शाहजहां ने एक खेल आयोजन किया, जिसमें चंबा के राजा पृथ्वी सिंह को भी बुलाया गया। फोटो : प्रवीन कुमार
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उसी रात को जब राजा पृथ्वी सिंह सोये तो उनके सपने में रघुवीर जी आए और उन्होंने राजा को जीत का आशीर्वाद देते हुए बताया कि वे बादशाह के खजाने में कैद हैं। फोटो : प्रवीन कुमार
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कहा जाता है कि प्रतियोगिता में जब राजा अपने घोड़े को दौड़ा रहे थे, तो उन्हें छोटी सी देवी नजर आ रही थी। इसे देखते-देखते राजा रेस जीत गए। फोटो : प्रवीन कुमार
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इससे प्रसन्न शाहजहां से राजा पृथ्वी सिंह ने कुछ मांगने को कहा। पृथ्वी सिंह ने शाहजहां से कहा कि आपके खजाने मौजूद रघुवीर जी को उन्हें सौंप दिया जाए। फोटो : प्रवीन कुमार
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मिंजर मेले के इतिहास को 15वीं शताब्दी में भी जोड़ा जाता है। एक मत के अनुसार वर्ष 1559 से लेकर 1586 तक चंबा रियासत के राजा प्रताप सिंह रहे।
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जब वह कांगड़ा के तत्कालीन राजा को हराकर चंबा पहुंचे, तो चंबा की जनता ने उन्हें उनकी जीत पर गेहूं भेंट की। इसे मिंजर कहा जाता है। तब से यह मिंजर मेला मनाया जा रहा है। फोटो : प्रवीन कुमार
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उस समय मिंजर मेले के समापन पर राजा द्वाराभैंसे को रावी नदी में बहाकर जल देवता को समर्पित किया जाता था। अगर भैंसा रावी को पार कर जाता, तो शुभ माना जाता था, अगर आधे रास्ते से वापस लौटने पर अशुभ। फोटो : प्रवीन कुमार
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इससे बाढ़, सूखा या अन्य प्राकृतिक आपदा जैसी स्थिति की आशंका रहती थी। इस कारण कुछ समय बाद इस प्रथा को खत्म कर दिया था। अब मेले के समापन पर भैंसे की जगह नारियल, रेशम की डोर व कुछ सिक्के रावी मे बहाए जाते हैं। फोटो : प्रवीन कुमार
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तब से लेकर आज तक कई उतार चढ़ाव आए। इसके बावजूद यह प्रथा आज भी जिंदा है। हर वर्ष सावन माह के तीसरे से चौथे रविवार तक मिंजर मेले का आयोजन किया जाता है। इस दौरान जिलावासी बाहर से आए व्यापारियों से सामान खरीदते व बेचते थे। फोटो : प्रवीन कुमार
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अब व्यापार का तरीका बदल चुका है। मिंजर मेले के दौरान लगभग एक हफ्ता तक बहनें अपने भाईयों को मिंजर बांधती हैं। मिंजर रेशम के धागे से बनाई जाती है। जिलावासी इस धागे को कपड़े के साथ बांधते हैं। मिंजर मेले के समापन पर इस डोर को रावी नदी में बहा दिया जाता है। फोटो : प्रवीन कुमार
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प्राचीन काल में मिंजर मेले के बाद दो दिन तक भोजड़ी मेले का आयोजन किया जाता था। इस मेले में केवल महिलाएं व युवतियां भाग ले सकती थीं। महिलाएं लोक गीत गाती हुईं चामुंडा मंदिर पहुंचती थीं। फोटो : प्रवीन कुमार
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यहां पर चामुंडा माता की पूजा अर्चना की जाती थी। यह मेला भी मिंजर मेले का ही एक भाग था, लेकिन अब यह मेला नहीं मनाया जाता। समय के साथ इस मेले को खत्म कर दिया गया है। फोटो : प्रवीन कुमार