महिला खिलाड़ियों के प्रति नजरिया
भारत में लड़के तो क्रिकेट, फुटबॉल, वॉलीबॉल खेल सकते हैं, दौड़ सकते हैं और साइकिल चला सकते हैं, लेकिन खेलों के मामलों में लड़कियों के पास बहुत ज्यादा विकल्प नहीं रहे हैं। ऐसा लगता है कि भारत के समाज में जो लैंगिक भेदभाव व्याप्त है और जो लिंगभेद है कहीं न कहीं वही इसकी वजह है। नहीं तो इसकी क्या वजह हो सकती है कि जिन लोगों पर ये शोध किया गया उनमें से एक तिहाई ने एक से अधिक खेलों को महिलाओं के लिए सही नहीं माना। इन खेलों में कुश्ती, मुक्केबाज़ी, कबड्डी और वेट लिफ्टिंग जैसे खेल शामिल थे। शोध से ये भी पता चलता है कि महिलाओं के लिए 'सबसे कम अनुपयुक्त' माने जाने वाली खेलों में एथेलटिक्स और घर के अंदर ही खेले जाने वाले खेल भी शामिल हैं। लेकिन भारत की महिलाओं ने लैंगिक आधार पर बनाई गई धारणाओं को तोड़ा है और वैश्विक स्तर पर कुश्ती, मुक्केबाज़ी, कबड्डी और वेटलिफ्टिंग जैसे 'अनुपयुक्त माने जाने वाले खेलों' में अपनी छाप छोड़ी है। उन्होंने साबित कर दिया है कि वो मजबूत इरादों से बनी हैं। भारतीय महिला खिलाड़ियों ने ओलंपिक, कॉमनवेल्थ और एशियन गेम्स में कई अंतरराष्ट्रीय खिताब जीतकर भारत का मान बढ़ाया है।