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Navratri: जयपुर के राजा से रूठीं शिला मां ने घुमा ली गर्दन, मुगल क्यों नहीं तोड़ सके मंदिर, आस्था के नौ किस्से

सार

Navratri: जयपुर के राजा से रूठीं शिला मां ने घुमा ली गर्दन, मुगल क्यों नहीं तोड़ सके मंदिर, आस्था के नौ किस्से
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जानिए राजस्थान के प्रसिद्ध माता मंदिरों की आस्था से जुड़ी कहानी। - फोटो : अमर उजाला
देश भर के लोग नवरात्रि पर मां की आराधना में लीन हैं। माता के दर्शन के लिए मंदिरों में भक्तों की भीड़ है। घंटों इंतजार के बाद लोगों को मां के दर्शन हो पा रहे हैं। नवरात्रि में हम आपको राजस्थान के देश भर में प्रसिद्ध 9 माताओं के मंदिरों के दर्शन कराएंगे। इन मंदिरों की कहानियां भी हैरान करने वाली हैं। 1965 की जंग में जैसलमेर के तनोट माता मंदिर पर पाकिस्तानी ने सैकड़ों बम गिराए, लेकिन फटा एक भी नहीं। ऐसी ही सीकर के जीण माता मंदिर को मुगल सेना तोड़ने पहुंची तो मधुमक्खियों ने हमला कर दिया। इससे पूरी सेना भाग खड़ी हुई। वहीं, उदयपुर के ईडाणा माता मंदिर में माता रानी आग से स्नान करती हैं। इसी तरह अन्य मंदिरों की भी चमत्कार से भरी अलग-अलग कहानियां हैं। आइए अब चलते हैं इन मंदिरों की यात्रा पर...
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जैसलमेर: तनोट माता मंदिर 

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तनोट माता - फोटो : अमर उजाला
माता के इस मंदिर का निर्माण करीब 1200 साल पहले हुआ था। 1965 में भारत और पाकिस्तान की जंग के बीच माता ने जो चमत्कार दिखाया उससे उनकी प्रसिद्ध देश की नहीं विदेशों में भी छा गई। जंग के दौरान पाकिस्तानियों ने मां के मंदिर पर सैकड़ों बम गिराए, लेकिन उनके चमत्कार से एक भी नहीं फटा। जैसलमेर से 130 किमी. दूर भारत-पाकिस्तान सीमा पर स्थित इस मंदिर के चमत्कार को सेना का हर जवान जनता है। पाकिस्तान से जंग के बाद यह मंदिर सीमा सुरक्षा बल को ही दे दिया गया। तब से आज तक मंदिर में पूजा-अर्चना सेना के जवान ही करते हैं। पाकिस्तानियों द्वारा मंदिर में गिराए गए 450 बम आज भी मंदिर परिसर में बने एक संग्रहालय में रखे हैं। मंदिर में आने वाले भक्त बिना फटे इन बम को देखकर हैरान रह जाते हैं।
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बांसवाड़ा: त्रिपुर सुंदरी मंदिर 

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5 फीट ऊंची मां भगवती त्रिपुर सुंदरी की मूर्ति अष्ठादश भुजाओं वाली है। - फोटो : सोशल मीडिया
माता का यह मंदिर बांसवाड़ा से 19 किमी दूर है। कुषाण तानाशाह के शासन से पहले बनाए गए इस मंदिर को माता तुर्तिया के नाम से भी जाना जाता है। मंदिर में काले पत्थर पर खुदी हुई देवी की मूर्ति प्रतिष्ठित है। 5 फीट ऊंची मां भगवती त्रिपुर सुंदरी की मूर्ति अष्ठादश भुजाओं वाली है। यह मंदिर एक शक्ति पीठ के रूप में भी प्रसिद्ध है। सप्ताह के सातों दिन मां का अलग-अलग रूप में  श्रृंगार किया जाता है। सोमवार को सफेद, मंगलवार को लाल, बुधवार को हरा, गुरुवार को पीला, शुक्रवार को केसरिया, शनिवार को नीला और रविवार को पंचरंगी रंग में मां का श्रृंगार किया जाता है। मान्यता के अनुसार मां के सिंह, मयूर कमलासिनी होने और तीन रूपों में कुमारिका, मध्यांह में सुंदरी यानी यौवना और संध्या में प्रौढ़ रूप में दर्शन देने से इन्हें त्रिपुर सुंदरी कहा जाता है।

सीकर: जीण माता मंदिर 

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जीण माता का मंदिर 1000 साल पुराना है। - फोटो : अमर उजाला
जिले के गोरिया गांव के दक्षिण में पहाड़ों पर स्थित जीण माता का मंदिर 1000 साल पुराना है। जीण माता को जयंती माता के नाम से भी जाना जाता है। तीन छोटे पहाड़ों के संगम पर स्थित यह मंदिर घने जंगल से घिरा हुआ है। मंदिर में संगमरमर का विशाल शिवलिंग और नंदी प्रतिमा मुख्य आकर्षण का केंद्र है।
कहा जाता है कि मुगल शासक औरंगजेब ने जीण माता और भैरों मंदिर को तोड़ने के लिए एक बार अपनी सेना भेजी, लेकिन मधुमक्खियों के एक झुंड ने मुगल सेना पर हमला कर दिया। मधुमक्खियों के हमले से बेहाल सेना मैदान छोड़कर भाग गई। लोगों ने इसे जीण माता का चमत्कार माना। 
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जयपुर: शिला माता मंदिर 

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शिला माता को आमेर का संरक्षक माना जाता है। - फोटो : सोशल मीडिया
शिला माता को आमेर का संरक्षक माना जाता है। आमेर किला विश्व धरोहर की सूची में शामिल है। ऐसे में देवी शिला माता मंदिर विश्व भर में प्रसिद्ध है। कहा जाता है कि राजा मान सिंह काली माता के बहुत बड़े भक्त थे। देवी शिला की इस मूर्ति वह बंगाल से लेकर आए थे। मंदिर में प्रतिष्ठित देवी की प्रतिमा की गर्दन टेढ़ी है। इसे लेकर एक किवदंती प्रचलित है। कहा जाता है की माता राजा मानसिंह से बात करती थीं। यहां देवी को नर बलि दी जाती थी, लेकिन एक बार राजा मानसिंह ने माता से नरबलि की जगह पशु बलि देने की बात कही तो देवी शिला रूठ गईं। उन्होंने गुस्से में अपनी गर्दन मानसिंह की ओर से दूसरी ओर घुमा ली। तब से इस प्रतिमा की गर्दन टेढ़ी है।
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उदयपुर: ईडाणा माता मंदिर

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ईडाणा माता खुश होने पर अग्नि स्नान करती हैं। - फोटो : सोशल मीडिया
शहर से 60 किमी दूर अरावली की पहाड़ियों के बीच स्थित यह मंदिर मेवाड़ के प्रमुख शक्ति पीठों में शामिल है। ईडाणा माता खुश होने पर खुद ही अग्नि स्नान करती हैं। ईडाणा माता राजपूत समुदाय और भील आदिवासी समुदाय सहित मेवाड़ की आराध्य मां हैं। बताया जाता है कि इस मंदिर का निर्माण महाभारत काल में हुआ था। ईडाणा माता का अग्नि स्नान देखने के लिए हर साल यहां बड़ी संख्या में भक्त पहुंचते हैं और मां के आशीर्वाद के लिए घंटों इंतजार करते हैं।
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करौली: कैला देवी मंदिर

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मां कैला देवी को भगवान श्री कृष्ण की बहन माना जाता है। - फोटो : सोशल मीडिया
मां कैला देवी का मंदिर देश भर में प्रसिद्ध है। यहां के लोग मां को यदुवंशी और भगवान श्री कृष्ण की बहन मानते हैं। मान्यता है कि माता कैला देवी के दर्शन करने वाले हर भक्त की मनोकामना पूरी होती है। यहां आना वाला भक्त कभी खाली हाथ नहीं लौटता। मां दर्शन के लिए मंदिर में पूरी भक्तों की भीड़ लगी रहती है। 

बीकानेर: करणी माता मंदिर 

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करणी माता मंदिर में चूहों का झूठा प्रसाद भक्तों को मिलता है। - फोटो : Social Media
यह मंदिर जिले के देशनोक में स्थित है। मंदिर में भक्तों के साथ-साथ चूहों की भरमार है, लेकिन यहां चूहों को 'काबा' कहा जाता है। इन्हें हर दिन दूध और लड्डू सहित अन्य चीजें खाने-पीने के लिए दी जातीं हैं। मंदिर में चूहे होने के कारण करणी माता के मंदिर को 'चूहों वाली माता' भी कहा जाता है। हैरानी बात यह है कि मंदिर में आने वाले भक्तों को चूहों का जूठा किया हुआ प्रसाद ही दिया जाता है। इसके बाद भी चूहों का जूठा प्रसाद खाने से आज तक कोई भी भक्त बीमार नहीं हुआ।  

जयपुर: शाकंभरी माता मंदिर 

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मां शाकंभरी के देश में तीन शक्तिपीठ हैं। - फोटो : सोशल मीडिया
जयपुर से 100 किमी. दूर सांभर कस्बे में स्थित यह मंदिर करीब 2500 साल पुराना है। शाकंभरी माता चौहान वंश की कुलदेवी हैं। उन्हें मां दुर्गा का अवतार भी माना जाता है। मां शाकंभरी के देश में तीन शक्तिपीठ हैं। इनमें से सबसे प्राचीन शक्तिपीठ यही माना जाता है। पौराणिक कथा के अनुसार, एक समय में पृथ्वी पर सौ साल तक वर्षा नहीं हुई। अन्न-जल की कमी से समस्त जीव भूख से मरने लगे, तब मुनियों ने देवी भगवती की उपासना की। जिससे खुश होकर मां दुर्गा ने एक नए रूप में अवतार लिया। उनकी कृपा से 100 साल बाद वर्षा हुई और अन्न-जल का संकट खत्म हुआ। शाक पर आधारित तपस्या के कारण मां का नाम शाकंभरी पड़ा। मां की कृपा से उत्पन्न हुई प्राकृतिक संपदा को लेकर बाद में झगड़े शुरू हो गए। इससे नाराज हुई मां शाकंभरी ने यहां की पूरी संपदा और खजाने को नमक में बदल दिया। इस तरह से सांभर झील की उत्पत्ति होना माना जाता है। आज के समय में करीब 90 वर्ग मील में नमक की झील है।
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जोधपुर: चामुंडा माता मंदिर 

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राव जोधा चामुंडा माता के बहुत बड़े भक्त थे। - फोटो : सोशल मीडिया
मेहरानगढ़ किले में स्थित यह मंदिर जोधपुर के सबसे पुराने और सबसे प्रतिष्ठित मंदिरों में से एक है। मां चामुंडा को राजपरिवार की देवी माना जाता है। बताया जाता है कि राव जोधा चामुंडा माता के बहुत बड़े भक्त थे। मेहरानगढ़ किले में 1460 में मां की प्रतिमा प्रतिष्ठित की गई थी। 
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