कॉमनवेल्थ गेम्स में 71 किलोग्राम भारवर्ग में कांस्य पदक जीतकर इतिहास रचने वाली नाभा के गांव मेहस की 25 साल की वेटलिफ्टर हरजिंदर कौर का अब तक सफर काफी संघर्षपूर्ण रहा। हरजिंदर कौर का परिवार गांव में एक कमरे के घर में रहता है। ठेके पर जमीन लेकर खेतीबाड़ी करने के कारण परिवार की आय सीमित है। ऐसे में पिता व भाई ने कर्ज लेकर हरजिंदर कौर को खेलों के क्षेत्र में इस मुकाम तक पहुंचाया। खुद हरजिंदर कौर घर में रखीं भैंसों के लिए टोका मशीन से चारा काटने का काम करती थीं।
वेटलिफ्टर मानती हैं कि मशीन पर चारा काटने के कारण उनके बाजू मजबूत बने और आज वह इसी वजह से कॉमनवेल्थ गेम्स में सफलता हासिल करके देश का नाम रोशन कर सकी हैं। इस मौके पर गांव मेहस में वेटलिफ्टर के घर पर जश्न का माहौल था। घर पर बधाई देने के लिए आने वालों का तांता लगा था। ढोल की थाप पर सभी नाच-गा रहे थे और एक-दूसरे का मुंह मीठा करा रहे थे।
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पंजाब की हरजिंदर कौर।
- फोटो : अमर उजाला
पहला प्यार था कबड्डी
हरजिंदर कौर का पहला प्यार पंजाब का प्रसिद्ध खेल कबड्डी था। इसके बाद उन्होंने रस्साकशी और फिर वेटलिफ्टिंग करना शुरू किया। धीरे-धीरे इस खेल में उनकी दिलचस्पी पैदा हो गई और उन्होंने अपने मजबूत बाजुओं के दम पर इसमें सफलता हासिल करनी शुरू कर दी।
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जश्न मनाते हरजिंदर के पिता।
- फोटो : अमर उजाला
सारा जीवन गरीबी में काटा, अब बेटी ने दूर कर दिए सारे दुख-दर्द
हरजिंदर के पिता साहिब सिंह ने बताया कि जब से बेटी के कॉमनवेल्थ गेम्स में कांस्य पदक जीतने की खबर मिली है, तब से जमीन पर पैर नहीं पड़ रहे हैं। सारा जीवन गरीबी में काटा। अब खुशी है कि बेटी ने उनके सारे दुख दर्द मिटा दिए। पिता ने नम आंखों से बताया कि वह हरजिंदर कौर को टोका मशीन से चारा काटने से रोकते थे, लेकिन वह कहती है कि पिता जी आपकी मदद करनी है। डांटने पर भी नहीं मानती थी। शुरू से ही पिता व भाई से उनका काफी लगाव रहा। पिता ने कहा कि उनका बेटी को लेकर सपना सच हो गया है।
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हरजिंदर की जीत पर गांव में जश्न।
- फोटो : अमर उजाला
साइकिल से पांच किमी दूर स्कूल में जाती थी
हरजिंदर कौर नाभा के सरकारी गर्ल्स स्कूल में पढ़ती थीं। जहां उन्होंने कबड्डी खेलना शुरू किया। घर से करीब पांच किलोमीटर दूर पड़ते इस स्कूल तक वह साइकिल से जाती थीं। इसके बाद जब उन्होंने आनंदपुर साहिब में कॉलेज जाना शुरू किया, तो वहां कोच सुरिंदर सिंह ने उन्हें कॉलेज की कबड्डी टीम में ले लिया। साल भर बाद उन्होंने पंजाबी यूनिवर्सिटी पटियाला के स्पोटर्स विंग को ज्वाइन किया, जहां कोच परमजीत सिंह ने उनकी काबलियत को पहचाना। हरजिंदर कौर के मजबूत बाजुओं को देखकर कोच ने उन्हें रस्साकस्सी टीम में ले लिया। इसके बाद उन्होंने हरजिंदर कौर को वेटलिफ्टिंग में आगे आने के लिए प्रेरित किया।
परिवार ने दोस्तों व रिश्तेदारों से ऋण तक लिया
परिवार की आर्थिक हालत अच्छी न होने के बावजूद हरजिंदर कौर को वेटलिफ्टिंग में आगे ले जाने पिता साहिब सिंह और बड़े भाई प्रितपाल सिंह ने उनका लगातार साथ दिया। पिता व भाई को हरजिंदर कौर के लिए अपने दोस्तों व रिश्तेदारों से ऋण तक लेना पड़ा। गांव के बैंक से 50 हजार रुपये लोन लिए। बाद में हरजिंदर और व उनके भाई ने मिलकर इसे चुकाया। परिवार के मुताबिक 2020 में कोरोना लॉकडाउन के दौरान हरजिंदर कौर ने कोच परमजीत शर्मा के पटियाला स्थित घर में रहकर वहां अपनी गेम के लिए अभ्यास किया। हरजिंदर कौर के खेल के प्रति इस लगाव ने उन्हें इस सफलता तक पहुंचाया है।
गौरतलब है कि 2017 में हरजिंदर कौर स्टेट वेटलिफ्टिंग चैंपियन बनीं। इसके बाद वह आल इंडिया इंटर यूनिवर्सिटी चैंपियन बनीं और सीनियर नेशनल में सिल्वर मेडल भी जीता। खेलो इंडिया इंटर यूनिवर्सिटी गेम्स में भी सिल्वर मेडल जीता। इसी साल उन्होंने उडीसा में 71 किलोग्राम भारवर्ग में सीनियर नेशनल में गोल्ड मेडल हासिल किया।