लोगों को हमेशा हंसाने वाली चाची अतरो उर्फ सरूप परिंदा सबको रुला कर चली गई। अंतिम संस्कार उनके घर के पास स्थित रामबाग में किया गया। कुछ अनकही बातें।
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हमेशा हंसाने वाली कॉमेडियन चाची अतरो नहीं रहीं, 14 अनकही बातें
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सरूप परिंदा, चाची अतरो
- फोटो : अमर उजाला
पंजाब के सभ्याचार को अपनी कॉमेडी के जरिए जीवंत रखने वाले सरूप परिंदा उर्फ चाची अतरो का शनिवार सुबह बठिंडा स्थित उनके घर पर देहांत हो गया। जैसे ही यह खबर पॉलीवुड पहुंची, पूरी इंडस्ट्री में शोक की लहर दौड़ गई। फोन से लेकर सोशल मीडिया में फिल्म इंडस्ट्री की बड़ी हस्तियां अतरो के परिवार को सांत्वना देती नजर आईं।
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सरूप परिंदा, चाची अतरो
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लेकिन, सरूप परिंदा उर्फ चाची अतरो के अंतिम संस्कार पर कोई भी प्रशासनिक अधिकारी नहीं पहुंचा। न ही पंजाबी फिल्म इंडस्ट्री की कोई हस्ती। सरूप परिंदा ने कई सामाजिक कार्य भी किए जिसकी वजह से उनके घर को जाने वाली रोड का नाम जिला प्रशासन ने परिंदा रोड रख दिया था। उन्हें अंतिम विदाई देने पंजाबी गायक हरदेव माहीनंगल, प्रेम स्नेही, छंटी चौहान के अलावा पूर्व सांसद परमजीत कौर गुलशन पहुंचीं।
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सरूप परिंदा, चाची अतरो
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सरूप परिंदा उर्फ चाची अतरो के छोटे बेटे गुरप्रीत सिंह ने बताया कि शनिवार सुबह करीब साढे़ तीन बजे पिता सरूप परिंदा उनके कमरे में आए और उन्हें बाहर घुमाने के लिए कहा। लेकिन उस समय बारिश हो रही थी। इस पर उन्हें कुछ समय घर में घुमाया गया। इस दौरान परिंदा ने कहा कि लगता है उनका समय आ गया है। फिर परिंदा अपने कमरे में चले गए। करीब 15 मिनट बाद गुरप्रीत उनके कमरे में गए तो परिंदा मृत थे।
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सरूप परिंदा, चाची अतरो
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चाची अतरो-चतरो की जोड़ी ने कॉमेडी को नए आयाम दिए। यह जोड़ी पंजाब में सुपरहिट हो चुकी थी। कोई भी पंजाबी फिल्म उनके बगैर बनना संभव नहीं था। चाची अतरो की कला से प्रभावित होकर उस समय के राष्ट्रपति ज्ञानी जैल सिंह ने चाची अतरो को एक पत्र लिखकर कहा था कि वह उनसे कभी भी मिल सकते हैं।
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सरूप परिंदा, चाची अतरो
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वर्ष 1936 में अर्जुन सिंह के घर जन्मे सरूप सिंह उर्फ चाची अतरो ने दस साल की उम्र में ही काम शुरू कर दिया था। इसके बाद वह इतने प्रसिद्ध हुए कि उन्हें पंजाब के अलावा विदेशों में भी शो करने के लिए बुलाने लगे। इसके अलावा उन्होंने कुछ वर्ष लोक संपर्क विभाग में कलाकार के तौर पर भी काम किया है। सरूप परिंदा उर्फ चाची अतरो जब वह 15 वर्ष के थे तो वह एक क्लब के समागम में कॉमेडी के लिए भाग लेने चले गए थे। वहां सरूप पंछी नाम का एक व्यक्ति था जो उन्हीं की तरह नकल करता था। इसके बाद लोगों ने उन्हें सरूप परिंदा कहना शुरू कर दिया।
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सरूप परिंदा, चाची अतरो
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सरूप परिंदा उर्फ चाची अतरो ने मौजूदा प्रदेश सरकार ने उनकी कला से प्रभावित होकर वर्ष 1956 में पंजाब के लोक संपर्क विभाग में कलाकार के तौर पर नौकरी दी थी। शुरुआत में विभाग उन्हें एक सौ पांच रुपये देता था। सरूप परिंदा जब 1988 में कार्यक्रम में भाग लेने अमेरिका गए थे तो वहां से वापस आने पर उनकी मुलाकात चाची चतरो उर्फ देस राज परिंदा के साथ हुई। इसके बाद एक हिंदी फिल्म में उनका नाम चाची अतरो रख दिया गया। इसके बाद लोग उन्हें चाची अतरो से जानने लगे।
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सरूप परिंदा, चाची अतरो
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हुण चाचा किहणू ताना देऊ- तेरी मूंगी मसरी ने टब्बर दी सेहत डौन जिही करती...। चाची अतरो के अनूठे किरदार को अमर करने वाले कलाकार स्वरूप परिंदा के निधन पर चाच चतर सिंह फेम जसविंदर भल्ला ने गहरा दुख जताया है। अमर उजाला से विशेष बातचीत में उन्होंने कहा कि शनिवार सुबह उन्हें बठिंडा में उनके निधन की खबर मिली। रविवार को ही बठिंडा जा रहा हूं।
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सरूप परिंदा, चाची अतरो
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भल्ला के अनुसार 1987 में एक फिल्म के सेट पर सरूप परिंदा से उनकी मुलाकात हुई थी। फिल्म के डायरेक्टर ने जब बताया कि परिंदा फिल्म में उनकी पत्नी का किरदार निभाएंगे तो उन्हें बड़ी हैरत हुई। उन्हें लगा कि यह कैसे होगा मगर जब परिंदा ने किरदार निभाया तो वह दंग रह गए और पूछा कि इतने दिन से कहां छुपे थे। हालांकि उससे पहले परिंदा 20 से 25 फिल्मों में मेहर मित्तल के साथ छोटी-छोटी भूमिकाएं निभा चुके थे।
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सरूप परिंदा, चाची अतरो
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पुरुष होकर भी सरूप परिंदा हमेशा महिला किरदार में रमे रहे। जसविंदर भल्ला के अनुसार उन्होंने कभी परिंदा के मुंह से लड़कों वाली गाली नहीं सुनी। यहां तक कि साला जैसे शब्द भी उनकी जुबान पर किसी ने नहीं सुने। वह ग्रामीण महिलाओं की तरह ही बात करते थे और उनकी तरह ही उलाहना देकर लड़ते थे। चाची के किरदार को उन्होंने आत्मसात कर लिया था। वह पढ़े लिखे नहीं थे, फिर भी किरदार और डायलाग पर उनकी पकड़ गजब थी।