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जहां देवी सीता ने गुजारे थे अपने जीवन के खास पल

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लक्ष्मी की अवतार देवी सीता के प्राकट्य को लेकर शास्त्रों में मतभेद है। कुछ स्थानों पर ऐसा उल्लेख मिलता है वैशाख शुक्ल नवमी को देवी सीता का प्राकट्य हुआ था। जबकि निर्णयसिंधु नामक पुस्तक के अनुसार देवी सीता का जन्म वैशाख कृष्ण अष्टमी को हुआ था। आज यही तिथि है। तो इस अवसर पर दर्शन कीजिए देवी सीता से संबंधित कुछ खास स्थानों के।
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जहां देवी सीता ने गुजारे थे अपने जीवन के खास पल

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सीतामढ़ी शहर से करीब 5 किलोमीटर की दूरी पर पुनौरा नामक स्थान है। यहां जानकी नाम से देवी सीता का मंदिर है। माना जाता है कि देवी सीता का जन्म इसी स्थान पर हुआ है। जनक की पुत्री होने के कारण देवी सीता जानकी भी कहलाती हैं।
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माना जाता है कि राजा जनक जब अपनी पत्नी के साथ हल चल रहे थे तब धरती से एक कलश प्राप्त हुआ जिससे देवी सीता प्राप्त हुई। जहां से यह कलश प्राप्त हुआ था अव बह स्थान सीता कुण्ड के नाम से जाना जाता है। पुनौरा धाम की इस तस्वीर में राजा जनक को हल चलाते हुए और साथ में सीता कुण्ड को आप देख सकते हैं।

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सीतामढ़ी शहर में देवी सीता का और भगवान राम का भव्य मंदिर है। इसे जानकी स्थान के नाम से जाना जाता है। कहते हैं कि पुनौरा में जब देवी सीता जनक को मिली तब सीता को लेकर जनक जी यहां पर आए थे। यहां रामनवमी एवं सीता नवमी के अवसर पर बहुत बड़ा मेला लगता है।
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राजा जनक की राजधानी जनकपुर थी जो आज नेपाल में है। यहां जानकी माता का एक भव्य मंदिर है। कहते हैं यह वही स्थान है जहां देवी सीता ने अपना बचपन गुजारा था। इस मंदिर में भगवान सीता के साथ भगवान राम और लक्ष्मण जी भी मौजूद हैं।
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जनकपुर से विवाह के बाद जब सीता अयोध्या आई तब रानी कैकेय ने सीता को मुंह दिखाई में कनक भवन दिया था। इस भवन में भगवान राम और सीता के अलावा किसी अन्य भगवान की मूर्ति नहीं है क्योंकि यह राम सीता का निवास स्थान था। भवन के आंगन में राम के परम भक्त हनुमान जी को स्थान प्राप्त है।
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भगवान राम के साथ जब देवी सीता वन को गई तब कुछ समय तक चित्रकूट में इनका निवास रहा। इसलिए चित्रकूट में भगवान राम और सीता के वन गमन के कई चिन्ह मिलते हैं। यहां तस्वीर में देवी सीता के चरण चिन्ह देखिए। कहते हैं यहां से देवी सीता चित्रकूट की सुंदरता को निहारा करती थी।

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चित्रकूट के बाद भगवान राम और सीता के जीवन में सबसे बड़ा मोड़ आया पंचवटी में। पंचवटी नासिक में है। यहां गोदवरी तट पर राम पर्णकुटि बनाकर देवी सीता और लक्ष्मण के साथ रहते थे। यहीं सूर्पणखा की नाक काटी गई थी और रावण ने यहीं से देवी सीता का हरण किया था।

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रावण ने सीता का हरण करने के बाद एक उद्यान में उन्हें ठहराया। यह स्थान अशोक वाटिका के नाम से जाना जाता है। माना जाता है कि यही वह स्थान है जहां देवी सीता ने राम के इंतजार में अपने दिन काटे थे। यहां हनुमान जी के चरण चिन्ह भी दर्शनीय है।
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देवी सीता का लालन पालन नेपाल में हुआ। नेपाल में ही सीता ने अपने सतीत्व की परीक्षा देते हुए धरती में समा गई। नेपाल के चितवन नामक स्थान में महर्षि बाल्मिकी का आश्रम था। इसी आश्रम में देवी सीता धरती माता की गोद में समा गई थी। माना जाता है कि यही वह स्थान है।
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