पंजाब के होशियारपुर के रहने वाले करनवीर सिंह का 70 साल पुराना इंतजार खत्म हो गया, जब उन्हें पाकिस्तान जाने की मंजूरी मिल गई। करनवीर सिंह के लिए यह पल काफी सुखद था क्योंकि इस बार वो महाराजा रणजीत सिंह की 176वीं पुण्यतिथि के मौके पर पाकिस्तान में होंगे।
सभी तस्वीरे-साभार-डान
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तस्वीरें: पाकिस्तान के इस गुरुद्वारे में शीश झुकाने जाते हैं हजारों भारतीय
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पाकिस्तान के हस्सानाबदल में स्थित गुरूद्वारा पंजा साहिब में इस बार करनवीर सिंह को जाने की इजाजत मिली है।
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करनवीर सिंह उन 400 लोगों में शामिल हैं जिन्हें इस साल भारत से पाकिस्तान जाने का वीजा मिला है।
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इस गुरूदारे में सिक्ख धर्म के संस्थापक बाबा गुरू नानक के हाथों के निशान एक पत्थर पर हैं जिसे लोग पूजने वहां जाते हैं।
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हर साल हजारों की संख्या में दुनिया भर से लोग धार्मिक पर्व के मौके पर यहां पर आते हैं।
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सिक्खों की मान्यताओं के मुताबिक लोग यहां के पवित्र पानी में स्नान भी करते हैं।
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करनवीर आज 80 साल के हो चुके हैं। गुरूद्वारे पहुंच कर वो भावुक हो जाते हैं। वह उस पल को याद करते हुए वो कहानी बताते हैं जब उन्होंने पाकिस्तान छोड़ कर भारत आने का फैसला किया।
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करनवीर उस समय 12 साल के थे। वो बताते हैं कि मुस्लिम और हिंदू सब साथ-साथ रहते थे। वो कहते हैं कि बंटवारे ने दोनों तरफ के लोगों के बीच एक तनावपूर्ण रेखा खींच दी थी।
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करनवीर कहते हैं कि पाकिस्तान को लेकर उनके दिल में कोई शिकवा गिला नहीं है। पाकिस्तान आज भी उने बचपन की यादों का एक अनमोल हिस्सा है जो आज भी उनके साथ ही है।
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यह सिर्फ करनवीर सिंह की कहानी नहीं है। बल्कि यहां आने वाले कई सिक्ख यात्री यही कहानी बयां करते हैं।
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करनवीर सिंह बताते हैं कि आज भी वो भारत में अपने मुस्लिम दोस्तों के साथ ईद का त्यौहार बड़ी खुशी के साथ मनाते हैं।
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इस गुरूद्वारे को लेकर सिक्ख समुदाय की आस्था काफी बड़ी है। हर साल हजारों लोग यहां आने के लिए वीजा का आवेदन करते हैं। पर खुशनसीब लोगों को ही यहां आने का मौका मिल पाता है। करनवीर को जब उनकी मां ने बताया कि वो पाकिस्तान जा रहे हैं तो उन्हें यह जानकर रात भर नींद ही नहीं आई। हमें सिर्फ दस दिन का वीजा मिला था। करनवीर सिंह अपने बचपन के उस घर तक जाना चाहते थे जहां वो रहते थे। पर वीजा के नियमों के मुताबिक वो वहां नहीं जा सके।
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करनवीर सिंह ने बताया कि मैं होशियारपुर छोड़ कर जाने के लिए तैयार नहीं था। पर गांव के बड़े सिक्ख और हिंदुओं ने किसी भी टकराव से बचने के लिए गांव छोड़ने का फैसला किया था। 60 वर्षीय दिलमीर सिंह बाजवा बताती है कि हम सभी पहली बार पाकिस्तान जा रहे हैं। कुछ लोगों का जुड़ाव सिर्फ इसलिए ही है। क्योंकि उनका जन्म स्थल पाकिस्तान में है।