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जवानी का सुख या फांसी का दुख, ईरानी जेल में यही सोचती हैं लड़कियां

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जेल के अंदर की जिंदगी हर आम कैदी के लिए कठिन ही होती है लेकिन जब बात ईरान जैसे देश की हो तो सोचा जा सकता है कि सख्ती के कितने कानून होंगे। ऐसे में वहां महिला मुजरिमों की जिंदगी कैसी होती है, किन स्थितियों में उन्हें रहना पड़ता है, सोच भी नहीं सकते।
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जवानी का सुख या फांसी का दुख, ईरानी जेल में यही सोचती हैं लड़कियां

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ईरान के जेलों में कई छोटी-छोटी नाबालिग लड़कियां भी कैद हैं। इनके ऊपर मर्डर, ड्रग्स तस्करी और हथियारों की चोरी जैसे मामले दर्ज हैं। लेकिन इनके लिए भी चुनौतियां कम नहीं है। घंटों खाने के लिए लाइन लगाना, गंदगी में नवजात बच्चों को पालना इनके लिए आसान नहीं होता।

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ईरान दुनिया का दूसरा ऐसा देश है जहां सबसे ज्यादा मौत की सजा सुनाई जाती है। महिला मुजरिमों को भी उनके जुर्म के लिए फांसी की सजा दी जाती है जबकि इनमें से कईयों को उचित सुनवाई का भी मौका नहीं मिलता। जबरन जुर्म कबूल करवाया जाता है और टॉर्चर किया जाता है।

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नाबालिग लड़कियों को जुविनाइल जेल में रखा जाता है और इनमें से ज्यादातर को 18 साल की होते ही मौत की सजा दे दी जाती है। पिछले साल देश में 830 लोगों को मौत की सजा सुनाई गई थी, जिनमें से चार नाबालिग थे।

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17 साल की मुजरिम महसा को चाकू घोंप कर अपने पिता के कत्ल के आरोप में जेल हुई थी। उसके भाइयों ने उसके लिए मौत की सजा की मांग की है। ऐसे ही 16 साल की नाजनीन को 6 महीने पहले 621 ग्राम कोकेन के साथ पकड़े जाने के जुर्म में सजा हुई थी। उसे इंतजार है कि न्यायाधीश आखिर क्या फैसला लेंगे।
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15 साल की शकायक को हथियारों की चोरी के आरोप में जेल हुई थी। वो जैसे ही 18 साल की होगी, उसे फांसी दे दी जाएगी। इनमें 17 साल की एक ऐसी भी लड़की है जो अपने नवजात बच्चे के साथ सजा काट रही है।

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महिला मुजरिमों को जेल के अंदर अपने बच्चे रखने की अनुमति है लेकिन तभी तक जब तक वे 2 साल के नहीं हो जाते। जहारा की 14 साल की उम्र में शादी हो गई थी और उसके दो बच्चे हैं। वो महिलाओं के मोबाइल फोन चुराने के जुर्म में जेल की सजा काट रही है। उसे इसी जुर्म के लिए तीन बार सजा हो चुकी है।

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पादरी हर दिन यहां आते हैं और सामुदायिक प्रर्थना करवाते हैं। इसके बाद वे लड़कियों से सुधार लाने के तरीकों पर बात करते हैं और अल्लाह से उनके लिए माफी मांगते हैं।

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एमनेस्टी इंटरनेशनल की रिपोर्ट में ये सामने आया है कि इरान में कई नाबालिग अपराधी मौत के इंतजार में हैं। जबकि ईरान का दावा है कि 18 साल से कम उम्र के अपराधियों पर सजा-ए-मौत का प्रावधान हटा दिया है।
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