हिंदुस्तान में अब वैसी जगहें कम हैं जहां औरतें नहीं जा सकतीं। कुश्ती सीखने की जगह जिसे महाराष्ट्र में तालीम कहते हैं, उनमें से एक है। 26 साल के दुबले-पतले अमोल साठे ने उस समय रोकते हुए कहा जब मैं तालीम में जाने की कोशिश कर रही थी जहां नौजवान लड़के कुश्ती के दांव-पेंच सीखते हैं। साठे ने कहा, "औरतें ध्यान भंग करती हैं इसीलिए उनका दूर रहना ही ठीक है।" लेकिन एक पत्रकार के लिए महिला-पुरूष का भेद उतना नहीं होता। मैनेजर से बात हुई और हमारा काम बन गया।
STORY-रूपा झा/बीबीसी संवाददाता
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वो पहलवान जिसे कोई छूना नहीं चाहता था, पर क्यों?
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मिट्टी की ताकत-बड़े से अखाड़े में कुछ नौजवान पहलवान कसरत कर रहे थे। नंगे बदन केवल एक लंगोट में। उनकी पसलियां तेल लगने से और चमक रही थीं। मेरी मौजूदगी से वे सब चौंक गए। थोड़ा शर्माते और झेंपते हुए पहलवानों की टोली लाल मिट्टी के गड्ढे में जा पंहुची जहां वे प्रैक्टिस करते हैं। हनुमान की तस्वीरों से सजी दीवारों की पपड़ियां उखड़ रही हैं। कोई एसी, कोई फैन नहीं है। प्रैक्टिस से पहले साठे के साथ दूसरे पहलवान भी तैयारी करते हैं। 200 दंड बैठक, कुछ और कसरत और फिर कुछ ही पल में हर कोई लाल मिट्टी से सना हुआ दिखता है। ये कोई साधारण मिट्टी नहीं है। साठे बताते हैं कि इसमें मक्खन, कर्पूर , नींबू, चीनी, हल्दी और कई तरह की जड़ी-बूटी का इस्तेमाल होता है। अमोल मुस्कुरा कर कहते हैं, "इस मिट्टी से हमें ताकत मिलती है"।
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जीतने की शर्त-माटी-कुश्ती के नियम अंतरराष्ट्रीय कुश्ती से अलग होते हैं। इस कुश्ती में खेल ख़त्म होने की कोई सीमा नहीं होती है। ये एक मिनट से एक घंटे तक चल सकती है। जीतने की शर्त केवल ये है कि अपने विरोधी पहलवान को चित कर उसकी पीठ को ज़मीन पर टिका दिया हो। अमोल बहुत फुर्तीले पहलवान हैं। मिनटों में वे अपने विरोधी को चित कर देते हैं। अमोल ने कई राष्ट्रीय खिताब जीते हैं। पहलवानी के जरिए अमोल ने जाति के उस शिकंजे से ख़ुद को आज़ाद किया जिसमें रहते हुए उनकी सांस उखड़ रही थी। अमोल अब अपनी पत्नी के साथ शहर में रहते हैं, दो कमरे के अच्छे से घर में।
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गांव से शहर तक का सफर आसान नहीं रहा होगा। उनके माता-पिता से मिलने हम सातारा ज़िले के मसौली गांव के लिए निकले।
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गांव पहुंचते ही ऐसा लगा कि अमोल कोई आम पहलवान नहीं कोई फिल्मी कलाकार हो। लोग उनसे मिलने के लिए उमड़ कर आते हैं। दो कमरे के छोटे से घर से उनके अभाव की ज़िंदगी का अंदाज़ा हो जाता है। बिना खिड़की के दो छोटे कमरे, एसबेस्टस की छत, पूरा घर भट्टी की तरह गर्म हो गया था। साठे के पिता मज़दूर हैं। अमोल को देखकर गर्व से मुस्कुराते हैं। वो कहते हैं, " हमारे पास तो पढ़ाई के साधन नहीं थे, कुछ भी ऐसा नहीं था जिससे जीने की उम्मीद बंधती। मैं दूसरे दलित बच्चों की तरह अपने बच्चों को ज़िल्लत की ज़िंदगी जीने नहीं देना चाहता था इसीलिए उन्हें पहलवानी सिखाई। ये एक ज़रिया है जिससे हमने इज़्ज़त कमाई।"
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दलित पहचान-लेकिन ये रास्ता आसान नहीं था। अमोल साठे के लिए सफल होना उनकी दलित पहचान के कारण और कठिन था। चाय की चुस्की के साथ अमोल बताते हैं, "मैने कभी नहीं सोचा था कि मैं एक सफल पहलवान बन सकता था। पहलवानी के लिए अच्छी खुराक चाहिए होती है। और हम कहां से इतना खर्च करते। पहलवान को दूध चाहिए, हमें वो भी नहीं मिलता था।" फ़ाके के दिन काटने वाले इतने मज़बूत कभी बन सकते हैं कि पहलवान बन जाएं? अमोल साठे के तीन भाई है। उनके माता-पिता मज़दूरी कर पेट पालते हैं। इतनी गरीबी के बावज़ूद उनके मां बाप ने उन्हें पहलवान बनाने की क्यों ठानी?
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धिक्कार की ज़िंदगी-अमोल बताते हैं कि यही सवाल उन्होंने अपने पिता से पूछा था और उनके पिता ने कहा कि जिस धिक्कार की ज़िंदगी उनका दलित समुदाय जीने को मजबूर था उससे वे निजात चाहते थे। बातें करते हुए अमोल के चेहरे पर कई भाव चढ़ उतर रहे थे। वो बताते हैं, " हम दलितों को लोग कीड़े मकोड़े से भी कमतर आंकते हैं। पानी तक छुआ नहीं पीते।" वो कहते हैं, "मुझे याद है किस तरह का व्यवहार हमारे साथ होता था। जब मैं दंगल में जाता था तो हमेशा खाना खाने के लिए अलग बिठाया जाता था। मुझे कभी नहीं लगा कि मैं खिलाड़ी हूं। क्या होती है खेल की भावना, पता नहीं चला। कई बार दूसरे पहलवान मेरे साथ खेलने से मना कर देते थे क्योंकि मै दलित हूं। आख़िर कुश्ती में तो आपको एक दूसरे की देह छूनी है।" उनके पिता ने ऐसी घृणा और तिरस्कार की ज़िंदगी से बाहर निकलने का जरिया बनाया कुश्ती को।
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पैसे की कमी-एक पहलवान की खुराक में महीने का कम से कम बीस हजार का खर्चा होता है। महाराष्ट्र में गरीब पहलवानों की मदद के लिए कई लोग सामने आते हैं जो उनके खाने-पीने का ख़र्चा उठाते हैं। अमोल साठे को मदद दी प्रकाश बापू थाटे ने। प्रकाश कुश्ती के एक दीवाने हैं। जब मेरी मुलाकात उनसे हुई तो मेरे पूछने पर कि आख़िर आप अपना पैसा पहलवानों पर क्यों लगाते हैं, बदले में आपको क्या मिलता है? वे पांचों उंगलियों में सजी अपनी अंगूठियों की तरफ नज़र फ़ेरते हुए कहते हैं, "मिलता है ये भरोसा कि हमारी कुश्ती ज़िंदा है। मदद कर सकने की स्थिति में हूं तो करता हूं। पहलवानी हमारी परंपरा का हिस्सा है। ये लड़के ग़रीब हैं पर बहुत होनहार है। सिर्फ पैसे की कमी के कारण इन्हें मौका न मिलना बहुत बुरा है।"
सवाल-मेरे लिए ये सब कुछ उतना ही अनूठा था जितना ये देखना कि कैसे कुश्ती ने जातिवाद की जड़ों को तोड़ने में कामयाबी हासिल की है।आँखो के सामने ये देखना कि कुछ चीजें आज भी नफ़ा नुकसान के तराज़ू से इतर है, थोड़ा चौंकाने वाला था। ऐसे ही उदार लोगों की मदद से अमोल साठे, एक ग़रीब दलित पहलवान आज इज़्ज़त की ज़िंदगी जी रहे हैं। अमोल की सफलता के कारण धीरे-धीरे लोग उनसे हाथ मिलाने के लिए आतुर होते गए। उनकी पत्नी जयमाला बहुत प्यार से अपने एक साल के बेटे को देखकर कहती हैं, "जितना अमोल ने किया उससे आगे बढ़कर अपने बेटे को कुश्ती में ले जाऊंगी- ओलंपिक मेडल जीतेगा मेरा बेटा।" मुझे उनके हौसलों पर शक नहीं, बस एक सवाल जरूर है – क्या फिर भी इन्हें बुलाया जाएगा– अछूत?