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PICS: हमारे मंदिरों जैसा ही है यजीदों का पूजा स्थल

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दीपक जलाती स्त्री का ये चित्र भारतीय मंदिरों में होता तो जरा भी कौतुहल न होता। हमारे मुल्क में मंदिरों ये घरों में अक्सर ऐसे चित्र दिख जाते हैं।
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PICS: हमारे मंदिरों जैसा ही है यजीदों का पूजा स्‍थल

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हालांकि ये पेंटिंग इराक में यजिदियों कें पूजा स्‍थल के दीवार पर बनी है। ये मंदिर लालेश में है। इराकी आतंकी संगठन आईएस के हमलों के बाद एकाएक चर्चा में आए इस समुदाय की कई मान्यताएं हिंदु धर्म से मिलतीजुलती हैं।
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कुर्दिश भाषी यजीदी समुदाय जिस देवता की पूजा करता है, वह मोर जैसा है। जिसे मलक ताउस कहा जाता है।

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य‌जीदियों के ईश्वर को याज्दान कहते हैं। याज्दान को सृष्टि का रचियता माना जाता है। माना जाता है कि याज्दान से सात महान आत्माएं निकलती हैं, जिनमें मलक ताउस सबसे महान हैं। यजीदी केवल मलक ताउस की ही उपासना करते हैं, इसलिए उन्हें एकेश्वरवादी भी माना जाता है।
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यजीदी दिन में पांच बार मलक ताउस की उपासना करते हैं। मलक ताउस का अन्य नाम शायतन भी है, जिसका अरबी में मतलब 'शैतान' है और इसी वजह से अरब में इन्‍हें 'शैतान का उपासक' भी माना जाने लगा।
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यजीदी धर्म में सूफी, यहुदी, ईसाइयत, हिंदु और पारसी धर्म के कई मान्यताएं शामिल हैं।
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यजीदी मानते हैं कि आत्मा एक शरीर से दूसरे शरीर में दाखिल होती है और अंत में मोक्ष पाती है। इसलिए वे पुनर्जन्म में यकीन रखते हैं।

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यजीदी के लिए धर्म निकाला सबसे दुर्भाग्यपूर्ण माना जाता है क्योंकि ऐसा होने पर उसकी आत्मा को मोक्ष नहीं मिलता।

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जटिल और अनूठी धार्मिक मान्यताओं के कारण यजीदियों को अक्सर 'शैतान के उपासक' मान लिया जाता है।

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पारंपरिक रूप से यजीदी उत्तर-पश्चिमी इराक, उत्तर-पश्चिमी सीरिया और दक्षिण-पूर्वी तुर्की में छोटे-छोटे समुदायों में रहते रहे हैं।

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आकलनों के मुताबिक उनकी तादाद 70 हजार से लेकर पांच लाख तक है।
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इस्लामिक स्टेट जैसे चरमपंथी समूहों को लगता है कि यह धर्म उमैयद राजवंश के दूसरे खलीफा और मुसलमानों में बेहद अलोकप्रिय शासक यजीद इब्न मुआविया (647-683) से निकला है।
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