बुधवार की शाम कानपुर में अमर उजाला रूपायन अचीवर्स अवार्ड कार्यक्रम आयोजित किया गया। इस कार्यक्रम में बॉक्सर मैरीकॉम के द्वारा उन महिलाओं को सम्मानित किया गया जिन्होंने कठिन और प्रतिकूल स्थितियों में न सिर्फ अपने जीवन को संवारा बल्कि समाज के लिए प्रेरणा का विषय बनीं। ये सभी महिलाएं समाज में अलग-अलग कार्यों में सक्रिय हैं।
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कानपुर क्लब में हुए इस कार्यक्रम में 15 महिलाओं को सम्मानित किया गया। इस कार्यक्रम में कनाडा उच्चायोग के उप उच्चायुक्त जेस डटन भी उपस्थित रहे। सम्मान समारोह के बाद बॉलीवुड गायक कुणाल गांजावाला ने अपने गीतों से लोगों का मनोरंजन किया।
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बहराइच की डा. बलमीत कौर को अचीवर्स अवार्ड में मैरी कॉम द्वारा सम्मानित किया गया। बलजीत कौर पिछले 22 सालों से गूंगे और बहरे बच्चों की शिक्षा के लिए काम कर रही हैं। देहदान कर चुकी डा. बलमीत ने बड़ी डिग्री होने के बावजूद जमीन से जुड़कर समाज सेवा करने में विश्वास दिखाया।
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अमर उजाला के अचीवर्स अवॉर्ड में कानपुर की डा. रंजना गुप्ता को भी सम्मानित किया गया। डा. रंजना ने परिवार की आर्थिक स्थितियों से जूझने के बावजूद शूटिंग को अपना पेशा बनाया। रंजना अमेरिका में आयोजित वर्ल्ड पुलिस शूटिंग चैंपियनशिप 2015 में कई पुरस्कार जीत चुकी हैं।
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इस कार्यक्रम में गोरखपुर की डा. सीमा त्रिपाठी भी सम्मानित हुईं। सीमा त्रिपाठी ने गणेश बिहारी मेमोरियल संस्था के माध्यम से गरीब बच्चों का शिक्षा दिलाने का बीड़ा उठाया है। वह लंबे समय से गरीब बच्चों को निःशुल्क शिक्षा देने का काम कर रही हैं।
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मेरठ की फातिमा शाहिद भी इस कार्यक्रम में सम्मानित हुईं। फातिमा शाहिद ने छोटी उम्र में बड़ा कारनामा करके दिखाया है। फातिमा 2006 से अब तक कई स्कूल छोड़ चुके बच्चों को फिर से स्कूल में दाखिल करवा चुकी हैं।
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देवरिया जिले की गिरिजा त्रिपाठी को भी अमर उजाला रुपायन अचीवर्स अवॉर्ड में सम्मानित किया गया। देवरिया की गिरिजा त्रिपाठी ने 1971 के युद्घ के बाद अपनों को खो चुकीं महिलाओं के दर्द को देखा तो अपना जीवन महिलाओं को सशक्कत बनाने में लगा दिया।
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इलाहाबाद की कमलेश कुमारी पालीवाल भी पुरस्कृत हुईं। इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में अध्यापन का काम कर रहीं कमलेश कुमारी पालीवाल लंबे समय से बच्चों की शिक्षा के लिए काम कर रही हैं। बुलंदशहर के अपने गांव में सांप्रदायिक दंगों में उनके पीस प्रोग्राम के लिए उन्हें सदभावना पुरस्कार भी मिल चुका है।
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मुरादाबाद की कंचन खन्ना इस कार्यक्रम में सम्मानित हुईं। दुर्भाग्य से कंचन के शरीर का अस्सी फीसदी हिस्सा अपाहिज है। बावजूद इसके उन्होंने परास्नातक तक की पढ़ाई पूरी की। पढ़ाई पूरी करने के बाद इन्होंने छठीं से दसवीं तक की अंग्रेजी ग्रामर और वर्क बुक की किताबें लिखीं। इसके अलावा कंचन निःशुल्क कोचिंग सेंटर भी चलाती हैं।
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कानपुर की माधवी सेंगर भी इस कार्यक्रम में सम्मानित हुईं। 22 साल पहले एक चलती बस से एक नवजात बच्ची को फेंक दिए जाने की घटना ने माधवी को झकझोर दिया। तभी उन्होंने खुद निःसंतान रहते हुए अपनी जिंदगी लड़कियों की बेहतरी के लिए समर्पित कर दी।
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इलाहाबाद की नेहा मेहरोत्रा भी यहां सम्मानित की गईं। नेहा के शरीर का अस्सी फीसदी हिस्सा लगभग विकलांग है, लेकिन इनकी समझदारी देखकर बड़े-बड़े दंग रह जाते हैं। इनकी प्रतिभा के लिए 2006 में तत्कालिन राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने राष्ट्रीय बालश्री सम्मान से सम्मानित किया।
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इलाहाबाद की रानी अवस्थी यहां सम्मानित हुईं। 1980 में अयोध्या घूमने आईं रानी अवस्थी ने जब मंद बुद्घि बच्चों को भीख मांगते देखा तो उनका मन पिघल गया। इस घटना के बाद उन्होंने अपनी जिंदगी मंद बुद्घि के नाम कर दी। वह तब से लगातार ऐसे बच्चों की बेहतरी के लिए काम कर रही हैं।
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रामपुर की शबनम खान को भी यहां सम्मानित किया गया। 19 साल से शबनम समाज सेवा के कामों में लगी हुई हैं। 2005 से उन्होंने बालश्रम के खिलाफ अभियान छेड़ रखा है। बालश्रमिकों के लिए रामपुर में चार स्कूल भी शबनम खोल चुकी हैं।
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वृंदावन की डा. लक्ष्मी गौतम भी सम्मानित हुईं। राष्ट्रपति द्वारा नारी शक्ति पुरस्कार समेत कई सम्मान पा चुकी डा. लक्ष्मी गौतम पिछले 19 सालों से वृंदावन की विधवाओं की जिंदगी को बेहतर करने की मुहिम में जुटी हुई हैं।
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गाजियाबाद की शारदा सिंह भी यहां सम्मानित हुईं। शारदा सिंह की सोच है कि हर महिला अपने पैरों पर खड़ी हो। 2007 में उन्होंने शांति, शिक्षा एवं नारी उत्थान समिति की नींव रखी। वे अब तक 26 हजार महिलाओं को उनके पसंद के काम का प्रशिक्षण देकर उन्हें आत्मनिर्भर बना चुकी हैं।
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बस्ती की अंजनि मल्लाह भी कार्यक्रम में सम्मानित हुईं। राष्ट्रीय स्तर की धाविका रह चुकी अंजनि मल्लाह को अपने गांव में शौचालय बनवाने के लिए लंबा संघर्ष करना पड़ा। आखिरकार उन्हें कामयाबी मिली। वे 26 शौचालय, एक आंगनबाड़ी केंद्र और एक स्कूल के लिए प्रशासन से हामी भरवा चुकी हैं।
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इस कार्यक्रम में डा. कुदसिया अंजुम भी सम्मानित हुईं। सहारनपुर जिले की रहने वाली पेशे से शिक्षिका डा. अंजुम ने 1999 में परचम संस्था की नींव रखी। जिसके माध्यम से वह मजबूरी में पढ़ाई छोड़ चुकी लड़कियों को एक बार फिर से स्कूल लाने की कोशिश कर रही हैं। (सभी फोटो: ओपी वाधवानी, अमर उजाला ब्यूरो, कानपुर)