सऊदी अरब ने शनिवार को शिया धर्मगुरु शेख निम्र अल-निम्र समेत 47 लोगों को शनिवार को फांसी दे दी। उन्हें आतंकवाद के मामले में दोषी ठहराया गया था। हालांकि निम्र की मौत के बाद से ही खाड़ी मुल्कों में उबाल आ गया है। शेख अल निम्र में आखिर ऐसा क्या था, सऊदी अरब ने क्यों दी उन्हें फांसी? पढ़िए-
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शेख निम्र: सऊदी शासकों को क्यों चुभता था ये शिया धर्मगुरु
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बेबाक बयानों के लिए मशहूर जस्टिस मारकंडेय काटजू ने मंगलवार को अपने फेसबुक पेज पर लिखा, ''अगर मैं सऊदी अरब में होता तो मुझे भी 56 वर्षीय शिया धर्मगुरू शेख निम्र अल निम्र की तरह मौत की सजा दे दी जाती।.....उनका गुनाह क्या था? शियाओं, जो कि सऊदी अरब में अल्पसंख्यक हैं, पर हो रहे जुल्मों के खिलाफ के उन्होंने आवाज उठाई, वह भी अहिंसक तरीके से।"
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शेख निम्र: सऊदी शासकों को क्यों चुभता था ये शिया धर्मगुरु
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शेख निम्र अल-निम्र को फांसी दिए जाने के बाद सऊदी अरब के खिलाफ शिया समुदाय का गुस्सा भड़क उठा। ईरान की राजधानी तेहरान में उग्र भीड़ ने सऊदी अरब के दूतावास में दूतावास और वाणिज्यिक दूतावास में आगजनी की, जिससे नाराज सऊदी अरब के ईरान से राजनयिक संबंध तोड़ लिए। उसने ईरान के साथ हवाई संपर्क भी समाप्त कर दिया।
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सऊदी अरब के फैसले का समर्थन करते हुए बहरीन और सूडान ने भी ईरान के साथ राजनयिक रिश्ते खत्म कर दिए और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) ने भी ईरान से अपने राजनयिकों को वापस बुलाया लिया। हालांकि सऊदी अरब और उसके समर्थक देशों के कड़े रुख के बाद भी शेख अल निम्र के समर्थन में उठ रही आवाजें थमीं नहीं है।
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शेख निम्र: सऊदी शासकों को क्यों चुभता था ये शिया धर्मगुरु
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निम्र बाकिर अल निम्र या शेख निम्र अल निम्र अरब के उसी 'बसंती झोंके' की देन थे, जिसे दुनिया भर में 'अरब स्प्रिंग' के नाम से जाना जाता है। 2010 की सर्दियों में अरब लीग और उत्तरी अफ्रीका के देशों में चली जनप्रदर्शनों की लहर ने मिस्त्र, लिबिया, यमन और ट्यूनिशिया में तख्तापलट कर दिया।
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2012 के मध्य तक ये लहर कमजोर पड़ी थी, लेकिन तब तक सीरिया गृहयुद्घ की लपटों में घिर चुका था। बहरीन, अल्जीरिया, जार्डन, सऊदी अरब और ओमान में सत्ता के खिलाफ विरोध प्रदर्शन हुए थे। सऊदी अरब में विरोध प्रदर्शनों का नेतृत्व शेख निम्र अल निम्र ने ही किया था।
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शेख अल निम्र युवाओं में लोकप्रिय थे, जबकि सऊदी अरब के शासकों के कड़े आलोचक थे। उन्होंने सऊदी अरब में स्वतंत्र चुनाव की वकालत की। सऊदी सरकार ने उन्हें 2006 में गिरफ्तार कर लिया। निम्र ने उस समय कहा था कि सऊदी अरब की गुप्त पुलिस 'मबाहिथ' ने उनकी पिटाई भी की थी।
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2009 में सऊदी सरकार की आलोचना करते हुए उन्होंने कहा था कि अगर शियाओं के अधिकारों का सम्मान नहीं किया जाता, तो पूर्वी प्रांत का सऊदी अरब से अलग हो जाना चाहिए। जिसके बाद उन्हें और उनके 35 सहयोगियों को गिरफ्तार कर लिया गया।
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2011-12 में 'अरब स्प्रिंग' के दरम्यान सऊदी शासकों के खिलाफ उन्होंने विरोध प्रदर्शनों का नेतृत्व किया। वे अहिंसक आंदोलन के समर्थक थे। उस समय उन्होंने कहा था कि सऊदी पुलिस की गोलियां के शोर का जवाब 'नारों की गूंज' से दो। उन्होंने घोषणा की थी कि अगर विरोध प्रदर्शन जारी रहे तो सऊदी सरकार धराशायी हो जाएगी। हालांकि 8 जुलाई, 2012 को पुलिस ने शेख अल निम्र के पैर में गोली मारकर उन्हें गिरफ्तार कर लिया।
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पुलिस ने दावा किया था कि शेख अल निम्र की ओर से गोलीबारी की गई थी, जिसके बाद उन्हें गिरफ्तार किया गया। अल निम्र की गिरफ्तारी के विरोध में हुए प्रदर्शन पर पुलिस ने गोलीबारी की थी, जिसमें दो लोगों की मौत हो गई थी।
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जेल में प्रताड़ना दिए जाने के विरोध में अल निम्र ने भूख हड़ताल कर दी थी, जिसपर अशरक सेंटर फॉर ह्यूमन राइट्स ने भी चिंता जताई थी। 15 अक्टूबर, 2014 को सऊदी अरब की विशेष आपराधिक अदालत ने अल निम्र को फांसी की सजा सुना दी। उन पर आरोप लगा था कि उन्होंने सऊदी अरब में विदेश हस्तक्षेप का प्रयास किया, शासकों की अवज्ञा की और सुरक्षा बलों के खिलाफ हथियार उठाया।
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शेख निम्र अल निम्र के भाई मोहम्मद अल निम्र ने ट्वीट कर सजा की जानकारी दी थी, जिसके बाद उन्हें भी गिरफ्तार कर लिया गया। शेख अल निम्र को 2 जनवरी 2016 को फांसी दी गई। शेख अल निम्र की सजा का विरोध ईरान, दुनिया भर में फैले शिया समुदाय, सांप्रदायिकता विरोधी सुन्नी मुसलमानों और तमाम बुद्घिजीवियों ने की। सऊदी अरब ने अल निम्र का शव भी परिजनों को सौंपने से इनकार कर दिया।
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शेख अल निम्र बहरीन के सुन्नी शासकों के भी विरोधी थे। बहरीन 2011 में सत्ता विरोधी आंदोलनों का कुचल दिया था, जिसकी उन्होंने तीखी आलोचना की थी। अगस्त, 2008 में उन्होंने अमेरिकी नागरिकों को शिया मुसलमानों का 'सहज सहयोगी' बताया था। उनका कहना था कि अमेरिकी नगारिकी और शिया, दोनों ही न्याय और स्वतंत्रता के समर्थक हैं।
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वे सऊदी शासन को 'प्रतिक्रियावादी' मानते थे। उनका मानना था कि सऊदी शासन को खत्म करने के लिए आंदोलन की आवश्यकता है। उन्हें ईरान का समर्थक माना जाता था, हालांकि 2008 में उन्होंने कहा था कि ईरान समेत सभी देश निजी हितों के लिए कार्य करते हैं, न कि धार्मिक एकता के लिए।
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अल निम्र कहते थे कि अगर सऊदी अरब में आंतरिक युद्घ होता है तो सऊदी शिया अंतरराष्ट्रीय शक्तियों का सहयोगी मांग सकते हैं, वैसे ही जैसे 1990–91 के खाड़ी युद्घ के दौरान कुवैत ने अमेरिका का मांगा था या कि दारफूर संकट के दौरान दारफूर ने मांगा था। सऊदी सरकार अल निम्र के इन्हीं बयानों से नाराज थी।
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वे सऊदी युवराज नायेफ बिन अब्दुल अजीज अल सऊद के आलोचक थे। जून, 2012 में उनकी मौत के बाद उन्होंने कहा था कि जनता का अब जश्न मनाना चाहिए, क्योंकि उसे अब कीड़े खाएंगे और कब्र में उसे नरक की यातनाएं सहनी पड़ेंगी।
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निम्र अल निम्र को फांसी दिए जाने पर संयुक्त राष्ट्र संघ, यूरोपीय यूनियन, कनाडा, फ्रांस और जर्मनी ने भी रोष प्रकट किया। जर्मनी ने कहा कि निम्र समेत 47 लोगों को फांसी दिए जाने को ध्यान में रखकर जर्मनी अब सऊदी अरब को हथियार और सैन्य उपकरण देने की समीक्षा करेगा।