महात्मा गांधी के सेक्रेटरी के तौर पर काफी सालों तक काम करने वाले, और उनके वंशजों में से एक कनु गांधी ने उनकी 2,000 से अधिक तस्वीरें ली थीं। इनमें से कई तस्वीरें सालों तक गुमनाम रहीं। इनमें से गांधी की जिंदगी के अंतिम दशक की 92तस्वीरों को बड़े ही एहतियात से नजर फाउंडेशन ने मोनोग्राफ के रूप में सहेजा है। नजर फाउंडेशन की बुनियाद जाने-माने फोटोग्राफर प्रशांत पंजियार और दिनेश खन्ना ने रखी थी। कनु गांधी को उनके माता-पिता ने 20 साल की उम्र में गांधी की मदद करने को सेवाग्राम भेज दिया था।
विज्ञापन
देखिए, सालों तक गुमनाम रही गांधी की आखिरी वो अनदेखी तस्वीरें
2 of 13
ये तस्वीर 1938 की है। महात्मा गांधी महाराष्ट्र में सेवाग्राम आश्रम में।
विज्ञापन
देखिए, सालों तक गुमनाम रही गांधी की आखिरी वो अनदेखी तस्वीरें
3 of 13
वो मेडिकल की पढ़ाई करना चाहते थे लेकिन फिर उन्हें फोटोग्राफी में दिलचस्पी पैदा हो गई। महात्मा गांधी असहयोग आंदोलन के बीच दर्जनों बार भूख-हड़ताल पर रहे। मशहूर फोटोग्राफर संजीव सेठ बताते हैं, ''अपने वजन पर हमेशा नजर रखने वाली ये तस्वीर उस इंसान के बारे में बहुत कुछ कहती है ''।1945 का साल और मुंबई का बिरला हाउस। गांधी अपना वजन देखते हुए।
देखिए, सालों तक गुमनाम रही गांधी की आखिरी वो अनदेखी तस्वीरें
4 of 13
कनु गांधी आमतौर पर महात्मा गांधी के आस पास ही रहते थे। ऐसे में कई ऐसे अंतरंग और एकांत के पल उनके कैमरे में कैद हो गए।साल 1940, सेवाग्राम में कड़ी धूप से बचने के लिए सिर पर तकिया रखे गांधी।
विज्ञापन
देखिए, सालों तक गुमनाम रही गांधी की आखिरी वो अनदेखी तस्वीरें
5 of 13
उत्तर-पश्चिम सीमा प्रांत में एक बार गांधी की गाड़ी कुछ ऐसे ही फंस गई थी। कनु गांधी ने महात्मा गांधी के साथ देश-दुनिया जगह जगह यात्राएं की।अक्टूबर 1938 में सड़क पर फंसी गांधी की गाड़ी को धक्का देते पठान और कांग्रेस कार्यकर्ता।
विज्ञापन
देखिए, सालों तक गुमनाम रही गांधी की आखिरी वो अनदेखी तस्वीरें
6 of 13
गांधी के जीवन के अंतिम दशक में कई अहम घटनाएं और क्षण गुजरे। कनु की तस्वीरों में उन सबकी कहानी कैद है। इन तस्वीरों में गांधी कई भाव में दिखते हैं। गहरे चिंतन में, तो कभी प्रसन्न, तो कभी चिंतित, तो कभी अपने समर्थकों के साथ।नवंबर 1938 में अबोटाबाद में महात्मा गांधी और कस्तूरबा।
विज्ञापन
देखिए, सालों तक गुमनाम रही गांधी की आखिरी वो अनदेखी तस्वीरें
7 of 13
तीन दिनों के उपवास के दौरान गांधी की मालिश करती हुई उनकी बड़ी बहन रालियातबेन और एक रिश्तेदार।मार्च 1939 में तीन दिनों के उपवास के दौरान गुजरात के राजकोट में गांधी।
देखिए, सालों तक गुमनाम रही गांधी की आखिरी वो अनदेखी तस्वीरें
8 of 13
ये तस्वीर साल 1940 की है।सेवाग्राम में एक ईसाई और अछूत लड़की के विवाह के दौरान गांधी और कस्तूरबा।
देखिए, सालों तक गुमनाम रही गांधी की आखिरी वो अनदेखी तस्वीरें
9 of 13
साल 1944 में पुणे के आगा़ खा पैलेस के एक बिस्तर पर कस्तूरबा गांधी अचेत अवस्था में लेटी हुई हैं।संजीव सेठ के अनुसार कस्तूरबा गांधी के जीवन के अंतिम महीनों की तस्वीर।
देखिए, सालों तक गुमनाम रही गांधी की आखिरी वो अनदेखी तस्वीरें
10 of 13
1938 की एक ऐतिहासिक तस्वीर जिसमें महात्मा गांधी और सुभाष चंद्र बोस हल्के-फुल्के अंदाज में बातचीत करते हुए। पीछे कस्तूरबा साड़ी का पल्लू खींचती हुईं दिखाई दे रही हैं। वैसे तो गांधी और सुभाष के बीच के संबंध जटिल रहे, उनके बीच काफी मतभेद भी रहे। सेठ कहते हैं, "इसे हम एक अविस्मरणीय तस्वीर कह सकते हैं। यहां भारत के दो बड़े नेता एक ही फ्रेम में हैं।"गांधी आजादी के एक अहम नायक सुभाष चंद्र बोस के साथ।
देखिए, सालों तक गुमनाम रही गांधी की आखिरी वो अनदेखी तस्वीरें
11 of 13
1940 में खिंची गई इस तस्वीर में गांधी और टैगोर चिंतन-मनन करते दिखाई दे रहे हैं।नोबेल पुरस्कार विजेता रविंद्रनाथ टैगार के साथ गांधी पश्चिम बंगाल के शांति निकेतन में।
देखिए, सालों तक गुमनाम रही गांधी की आखिरी वो अनदेखी तस्वीरें
12 of 13
महात्मा गांधी भारत में अछूतों की मौजूदा दशा के प्रति ख़ासे चिंतित रहा करते थे। उन्होंने 1945-46 के दौरान तीन महीने लंबी रेल यात्रा की और जगह-जगह जाकर धन जुटाया था। इसी संदर्भ में उन्होंने एक बार कहा था, "मैं बनिया हूं। मेरे लोभ का कोई अंत नहीं है।"बंगाल, असम और दक्षिणी भारत की रेल यात्रा के दौरान हाथ फैलाकर दान जुटाते गांधी।