मध्यप्रदेश के बडवानी ज़िले का पती ब्लॉक कभी ख़ूबसूरत हरा-भरा इलाक़ा था। आज वह रेगिस्तानी इलाक़े में तब्दील हो चुका है। मॉनसून से पहले यह पति-पत्नी अपने खेतों में बुवाई कर उसे तैयार करने में जुटे हैं। (साल 2010)
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तस्वीरों में.. मनरेगा से पहले, मनरेगा के बाद
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जिस इलाक़े में काम चलता है वहां महिलाएं भी बड़ी तादाद में देखने को मिलेंगी। ऐसी ही एक साइट पर रजिस्टर में अपनी मौजूदगी दर्ज कराने के लिए पहुंची महिलाएं। (2006)
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यहां पानी बेहद कम है। 2010 कुछ सबसे गर्म मौसमों में एक था जब मॉनसून भी देरी से आया था। पानी लाने के लिए महिलाओं को काफी दूरी तय करनी पड़ती है। (साल 2006)
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यह परिवार अपने दोनों बैलों को चारा खिलाने में जुटा है। बैल इस इलाके में समृद्धि की निशानदेही करते हैं क्योंकि कृषि ही रोजी-रोटी का सबसे बडा साधन है। (साल 2006)
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इस इलाके में ज्यादातर लोग बरेला समुदाय के हैं। मॉनसून में बदलाव ने इस समुदाय के लिए जीवन बहुत कठिन बना दिया है। (साल 2010)
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उबादगढ की सुबह का एक दृश्य। 2005 में मनरेगा योजना लागू होने से पहले यहां से लोगों का पलायन बहुत आम बात थी। (साल 2006)
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2006 में काप सिंह बेरोजगार पिता थे। 2005 में जब मनरेगा शुरू हुई तो एक व्यक्ति को साल में मजदूरी मिलने की दर सिर्फ छह से सात रोज ही थी। (साल 2006)
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16 साल की रेखा ने बेटी को घर पर ही जन्म दिया क्योंकि कोई डॉक्टर उपलब्ध नहीं था। सबसे निकट की मेडिकल सुविधा कम से कम एक दिन की दूरी पर है और वहां तक जाने के लिए इन्हें कोई वाहन नहीं मिल पाया था। बच्ची को जन्म देने के दौरान वह बीमार हो गईं मगर वह खुश थीं क्योंकि पहली बार मां बनी थीं। (साल 2010)
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पूरा इलाका अब बंजर और रेगिस्तानी दिखता है। यहां कभी हरे-भरे पेड हुआ करते थे। (साल 2010)
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पती से जिन लोगों ने पलायन नहीं किया था, वो ज्यादा से ज्यादा 15 से 20 रुपए कमा पाते थे। हालांकि मनरेगा की वजह से अब उनकी स्थिति में कुछ सुधार आया है। (साल 2006)
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स्थानीय संगठन जागृत आदिवासी दलित संगठन ने लोगों को अपने अधिकारों के लिए लड़ने को तैयार किया। तब लोगों को अपने मूलभूत अधिकारों का पता चल पाया। (साल 2006)
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मनरेगा की साइट पर समुदाय के जवान और बुजुर्ग दोनों को ही काम मिलने की गुंजाइशें पैदा हो पाईं। (साल 2006)
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जिस इलाके में काम चलता है वहां महिलाएं भी बडी तादाद में देखने को मिलेंगी। ऐसी ही एक साइट पर रजिस्टर में अपनी मौजूदगी दर्ज कराने के लिए पहुंची महिलाएं। (साल 2006)
मजदूरी न मिलने पर महिलाओं ने आंदोलन भी किया। आंदोलन के अगले ही दिन उन्हें उनकी मजदूरी मिल गई। (ये सभी तस्वीरें फोटोग्राफर सोहराब हूरा ने 2006 और 2010 में खींची थीं)