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ऐसा भी हो सकता है, हैरान कर देंगी मेरठ की ये तस्वीरें

Mon, 08 Sep 2014 06:55 PM IST
ब्यूरो/अमर उजाला, मेरठ
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मेरठ में दो अविवाहित भाइयों हरीश और हरेंद्र की जिंदगी की यह सच्चाई दिल को दहला देने वाली है। हरेंद्र डॉक्टर थे और हरीश एयर फोर्स में अफसर। शास्त्री नगर के आलीशान मकान में दोनों रहते थे। आम तौर पर दोनों बाहरी दुनिया से अलग अपनी दुनिया में खोए रहते थे। अखबार और टिफिन वाले के अलावा किसी और से इनका नाता भी न के बराबर था।
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एक दिन न जाने कैसे कमरे में ही डॉक्टर हरेंद्र की मौत हो गई। और उनके साथ रह रहे दिमागी तौर पर कमजोर भाई को इसका अंदाजा भी नहीं लगा। वह शव के साथ दिन-रात कमरे में बंद रहा। एक माह बीत चुके हैं, उसे अब यकीन नहीं है कि उसका भाई अब नहीं रहा। उसकी जुबां पर बस यही शब्द हैं, ‘भाई बीमार है। अभी सो रहा है। यहां से चले जाओ।’
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शनिवार की रात यह हृदयविदारक घटना तब सामने आई, जब पड़ोसियों की सूचना पर मेडिकल थाना पुलिस पहुंची। पुलिस ने मकान नंबर 163 का दरवाजा तोड़ा, तो बेड पर सड़ी-गली लाश पड़ी थी और बगल में नीचे हरेंद्र का बड़ा भाई हरीश बगाई कपड़ा बिछाकर सोया हुआ था। पुलिस को देखकर हरीश आक्रोशित हो गया और पुलिसकर्मियों से वापस जाने को कहने लगा। जैसे तैसे हरीश को समझाकर पुलिस ने शव को मोर्चरी भिजवाया।

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मेडिकल थाना प्रभारी एमपी सिंह के अनुसार डाक्टर हरेंद्र कुमार बंघाई की उम्र करीब 55 वर्ष रही होगी। वे स्वास्थ्य विभाग में सर्जन थे। 2006 में उन्होंने सरधना सीएचसी से वीआरएस लिया था।
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पड़ोसियों ने मकान से बदबू आने की सूचना दी थी। साथ ही यह भी बताया था कि दोनों भाई काफी दिन से दिखे नहीं हैं। उन्होंने बताया कि हरीश एयरफोर्स और एलआईसी में अधिकारी रह चुके हैं।
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पड़ोसियों का कहना है कि मकान में लगभग एक माह से कोई हलचल नहीं थी। सभी दरवाजे अंदर से बंद थे और लाइट भी बंद थी। जबकि रसोई में खाने व पीने की कोई व्यवस्था नहीं दिखी। पुलिस ने माना है कि मौत करीब एक माह पहले हुई होगी।
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थाना प्रभारी एमपी सिंह ने बताया कि करीब 10 साल पूर्व डॉक्टर की बहन का शव भी इसी मकान में मिला था। इनकी दूसरी बहन दिल्ली में रहती है और शादीशुदा है। मृतक के दो भाई और हैं, जो विदेश में रहते हैं। उनके बारे में ठोस जानकारी नहीं मिल सकी। मकान की निगरानी के लिए दो सिपाही तैनात किए गए हैं।

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वाकई यह संवेदनहीनता की हद ही है। पड़ोस में कोई मर जाए और कई हफ्ते तक किसी को पता न चले। यह कैसे हो सकता है, पर ऐसा ही हुआ, वह भी शहर के सबसे पॉश इलाके में गिने जाने वाले शस्त्रीनगर बी ब्लाक में। सच में यहां लाश नहीं इंसानियत शर्मसार हुई।

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डाक्टर हरेंद्र की मौत तो हो गई, मगर उनके भाई हरीश बगाई को नारकीय जीवन से निकालकर सुधार करने के लिए सहारे की जरूरत है। प्रशासन और स्वयंसेवी संस्थाएं इन्हें सहारा दे सकती हैं, मगर कोई आगे नहीं आ रहा। मानवाधिकारों और सामाजिक सरोकार का ढोल पीटने वालों को ये सब दिखाई क्यों नहीं देता। क्या ऐसे बुजुर्गों की मदद नहीं करनी चाहिए, जो एकाकीपन से घिरे हुए हैं।

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ताज्जुब तो ये है कि रविवार को समाचार पत्रों में डाक्टर हरेंद्र की मौत और उनके परिवार की दुख भरी दास्तां प्रमुखता से प्रकाशित होने के बावजूद किसी संस्था ने इनके घर तक पहुंचने की जरूरत नहीं समझी। पूर्व में भी किसी संस्था ने प्रयास नहीं किया कि इन दोनों भाईयों के बारे में कुछ सोचा जाए। प्रशासन से सहयोग लेकर यदि इन्हें अस्पताल में भर्ती करा दिया जाता, तो शायद ये हाल न होता।

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अब भी हरीश उसी तरह की बीमारी से घिरे हुए हैं, मगर चिंता करने वाला कोई आगे नहीं आया। ऐसा लगता है कि जैसे सब सो रहे हैं गहरी नींद में। प्रशासन चाहे, तो हरीश बगाई के मानसिक रोग का इलाज कराया जा सकता है। क्या सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं ऐसे लोगों के काम भी नहीं आ सकती हैं। या फिर प्रशासन में बैठे लोग इस तरह की घटनाओं को तवज्जो नहीं देते।

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जिस तरह से डाक्टर हरेंद्र ने मकान के भीतर ही दम तोड़ा। एक महीने तक उनका शव बेड पर पड़ा सड़ता रहा। आशंका है कि यदि डाक्टर के भाई हरीश के बारे में किसी ने गंभीरता से विचार नहीं किया और उन्हें उपचार नहीं दिलाया, तो नरक बन चुकी उनकी जिंदगी का अंत भी कुछ ऐसा ही होगा।

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आसपास आलीशान कोठियां, मगर इनके बीच करीब 250 वर्ग गज में बने बगाई भवन की हालत बहुत खराब हो चुकी है।

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मेन गेट के भीतर बरामदे में पानी फैला रहता है, क्योंकि टोंटी टूटी हुई है।

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रसोई में दो फ्रिज रखे हैं, जिनमें खाने पीने का सामान नहीं, बल्कि खाली बोतल, कागज और कचरा भरा हुआ है।

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दीवारें जर्जर हो चुकी हैं, पुताई भी वर्षों से नहीं हुई। अंदर तीन कमरे हैं, मगर सब कचरे से भरे हुए हैं।
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रसोई में दो सिलेंडर हैं, गैस चूल्हा भी है। चूल्हे पर चाय और खाना बनाने के बर्तन हैं, मगर लगता नहीं, काफी दिन से इनमें कुछ पकाया गया।
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