पिता की मृत्यू के चलते कम उम्र में ही फिल्मों में आना पड़ा। दो तेलुगू फिल्मों के बाद जब उनको गुरुदत्त से मिलने का मौका मिला, तो खुद उनके सामने नहीं जा सकीं। उनकी मां गुरुदत्त से मिलने गईं। बाद में गुरूदत्त ने वहीदा को स्क्रीन टेस्ट के लिए बुलाया और अपनी फिल्म सीआईडी (1956) में 'खलनाइका' काम दिया।
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साल 1957 में वहीदा को एक बार फिर से गुरूदत्त की फिल्म 'प्यासा' में काम करने का मौका मिला। फिल्म के निर्माण के समय फिल्म अभिनेत्री के रूप में मधुबाला का नाम प्रस्तावित था, लेकिन गुरुदत्त को भरोसा था कि फिल्म के चरित्र के साथ केवल वहीदा रहमान ही इंसाफ कर सकती हैं।
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गुरुदत्त और वहीदा अभिनीत फिल्म कागज के फूल (1959) की असफल प्यार कहानी उन दोनों के खुद की जिंदगी पर आधारित थी।
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साल 1960 में वहीदा रहमान की यादगार फिल्म 'चौदहवीं का चांद' रिलीज हुई, जो सुपरहिट रही। इस फिल्म के एक गाने 'चौदहवीं का चांद हो, या आफताब हो, जो भी हो तुम खुदा की कसम, लाजवाब हो' ने दर्शकों को वहीदा का दीवाना बना दिया।
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साल 1962 में वहीदा रहमान की 'साहब बीबी और गुलाम' रिलीज हुई। फिल्म के निर्माण के समय वहीदा रहमान छोटी बहू के किरदार को निभाना चाहती थी, लेकिन इस किरदार के लिए अभिनेत्री मीना कुमारी को उपयुक्त समझा गया। इस बात को लेकर वहीदा काफी दुखी हुईं। वहीदा का मन रखने के लिए फिल्म निर्देशक ने 'छोटी बहू' के रूप में उनका स्क्रीन टेस्ट लिया, लेकिन वह इसमें सफल नहीं रही।
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10 अक्टूबर, 1964 को गुरुदत्त ने कथित रूप से आत्महत्या कर ली थी जिसके बाद वहीदा अकेली हो गई, लेकिन फिर भी उन्होंने कॅरियर से मुंह नहीं मोड़ा। और इसके बाद उनकी फिल्म गाइड ने उन्हें निजी जिंदगी की उलझनों से निकाल कर बुलंदियों पर पहुंचा दिया।
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इसी बीच उनकी कुछ फिल्में और भी आईं, लेकिन गाइड के लिए उन्हें फिल्मफेयर सर्वेश्रेष्ठ अभिनेत्री का पुरस्कार मिला। ये तस्वीर फिल्म काला बाजार की है।
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फणिश्वरनाथ रेणु की कहानी मारे गए गुलफाम पर शैलेंद्र ने 1966 में तीसरी कसम फिल्म बनाई थी। बेहतर पटकथा, लोकसंगीत, गीत, यादगार अभिनय पर न जाने यह फिल्म क्यों नहीं चली। शैलेंद्र के पास जो कुछ था इस फिल्म में लुट गया। लेकिन तीसरी कसम के गीत संगीत और हीराबाई हीरामन का अभिनय यादगार रहा।
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1968 में आई नीलकमल के बाद एक बार फिर से उनके करियर को आसमान पर पहुंचा दिया। इस फिल्म के लिए उन्हें फिर फिल्मफेयर अवार्ड मिला।
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अभिनय के क्षेत्र में बेमिसाल प्रदर्शन के लिए उन्हें साल 1972 में पद्म श्री से नवाजा गया।
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वहीदा ने नमक हलाल में अमिताभ के दोस्त शशि कपूर की मां का किरदार भी निभाया है और कभी-कभी में उनकी पत्नी का भी।
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साल 1974 में उनके साथ काम करने वाले अभिनेता कमलजीत ने उनसे शादी का प्रस्ताव रखा जिसे वहीदा रहामान ने सहर्ष स्वीकार कर लिया और शादी के बंधन में बंध गईं।
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वर्ष 2000 उनके जिंदगी में एक और धक्के के रुप में आया जब उनके पति की आकस्मिक मृत्यु हो गई पर वहीदा ने यहां भी अपनी इच्छाशक्ति का प्रदर्शन करते हुए दुबारा फिल्मों में काम करने का निर्णय लिया।
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वाटर, रंग दे बसंती और दिल्ली 6 जैसी फिल्मों में अपनी बेजोड़ अदाकारी का परिचय दिया।
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साल 2011 में पद्म विभूषण पुरस्कार से सम्मानित किया गया।
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उन्होंने इस साल भी तमिल फिल्म बिश्वरूपम 2 और इसी के हिन्दी वर्जन विश्वरूप 2 के अलावा एक बंगाली फिल्म अर्शीनागर की है।
पति की मृत्यु के बाद अब वहीदा बंगलूरू छोड़कर मुंबई में अपने दो बच्चों के साथ रहती हैं। यूं तो उनकी फिल्मों की गिनती करने बैठ जाएं तो सुबह से दोपहर हो जाए, पर अब भी उनका अभिनय सफर जारी है। हम उनकों उनके 77वें जन्मदिन की अनंत शुभकामनाएं देते हैं।