ये सब हीरो बनने का सपना लेकर मुंबई पहुंचे थे लेकिन तकदीर ने इन्हें हीरो न बनाकर किसी और वजह से कर दिया मशहूर। देखिए इन मशहूर सितारों की तस्वीरें।
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हीरो न बन पाए लेकिन हीरो से भी ज्यादा मशहूर हुए ये सितारे
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सुभाष घई सुभाष घई भी फिल्मों में हीरो बनने का सपना लेकर मुंबई पहुंचे थे। उन्होंने नायक के रूप में दो चार फिल्में की भी लेकिन कोई खास नहीं चल पाई। उन्होंने 1967 में तकदीर 1971 में आराधना फिल्म में एक्टिंग की। 1970 में रिलीज हुई उमंग और गुमराह (1976) में तो सुभाष घई लीड रोल में थे। लेकिन फिल्में नहीं चली और सुभाष का ध्यान फिल्म निर्देशन की तरफ गया। सुभाष में एक्टिंग का कीड़ा इस कदर था कि अपनी हर फिल्म में में वो दो या तीन मिनट के लिए परदे पर जरूर नजर आए।
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राजकुमार हीरानी मुन्ना भाई एमबीबीएस, थ्री इडियट और पीके जैसी फिल्म डायरेक्ट करने वाले राजकुमार हीरानी भी फिल्मों में हीरो बनने का सपना लेकर मुंबई पहुंचे थे। लेकिन हीरो न बन पाने की स्थिति में वो एड फिल्मों में एक्टिंग करने लगे। उन्होंने टीवी के लिए फेविकोल और काइनेटिक लूना के एड भी किए। एड इंडस्ट्री से कुछ समय का ब्रेक लेकर उन्होंने विधु विनोद चोपड़ा की फिल्म यूनिट ज्वाइन कर ली और बाद में फिल्म निर्देशन में कूद पड़े। हीरानी को तीन राष्ट्रीय पुरस्कार मिल चुके हैं।
हीरो न बन पाए लेकिन हीरो से भी ज्यादा मशहूर हुए ये सितारे
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सलीम खान सलमान खान के पिता और मशहूर स्क्रिप्ट राइटर सलीम खान भी फिल्मी दुनिया में हीरो बनने का सपना लेकर मुंबई आए थे। उन्होंने बतौर हीरो एक दो फिल्मों में काम भी किया लेकिन अफसोस फिल्में नहीं चल पाई। तब उन्होंने जावेद अख्तर के साथ मिलकर फिल्मों की पटकथा लिखने का काम शुरू किया और शोले की पटकथा लिखकर बॉलीवुड में इतिहास रचा।
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अमरीश पुरी आपको जानकर हैरानी होगी कि बॉलीवुड में मोगेंबो के नाम से मशहूर विलेन अमरीश पुरी भी फिल्मों में हीरो बनने का सपना लेकर आए थे। अमरीश के बड़े भाई मदन पुरी फिल्मों के जाने माने विलेन थे लेकिन अमरीश हीरो बनना चाहते थे। उन्होंने कई कोशिशें की लेकिन जब एक निर्देशक ने कहा कि तुम्हारा चेहरा हीरो जैसा नहीं लगता, तो अमरीश का दिल टूट गया और उन्होंने विलेन के रूप में ख्याति प्राप्त की। खुद अमरीश ने एक इंटरव्यू में बताया था कि हीरो के रूप में अस्वीकार किए जाने के बाद वो कुछ दिन थिएटर करते रहे और फिर उन्हें फिल्मों में नकारात्मक भूमिकाएं मिलने लगी।
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प्रेम चोपड़ा 'प्रेम नाम है मेरा...प्रेम चोपड़ा' 60 और 70 के दशक में विलेन के रूप में बॉलीवुड में झंडे गाड़ने वाले प्रेम चोपडा़ ने भी हीरो बनने की ख्वाहिश के साथ मुंबई नगरिया में प्रवेश किया था। उन्हें कुछ फिल्में भी बतौर हीरो मिलीं लेकिन चॉकलेटी फेस होने के बावजूद प्रेम चोपड़ा हीरो के रूप में सफल नहीं हो पाए। धीरे धीरे उन्हें नकारात्मक भूमिकाएं मिलने लगी जिससे उनकी विलेन छवि बनी। एक दौर ऐसा आया जब प्रेम चोपड़ा विलेन के रूप में इंडस्ट्री में ख्याति पा चुके थे और हर फिल्म में उन्हें लेने की कोशिश की जाती थी।
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प्राण प्राण ने अपनी जिंदगी की पहला रोल रामलीला में सीता के तौर पर किया। उस समय राम का रोल मदन पुरी कर रहे थे। मदन पुरी ने ही प्राण की प्रतिभा को पहचान कर उन्हें फिल्मों में एक्टिंग करने को कहा। प्राण ने 22 फिल्में हीरो के तौर पर की लेकिन तभी भारत पाक विभाजन हुआ और प्राण लाहौर में रह गए। उनकी रोजी रोटी पर संकट आ गया और मजबूरन उन्हें मुंबई आना पड़ा। मुंबई आने के बाद इन्हें हीरो के रोल तो नहीं मिले लेकिन विलेन के रोल मिलने लगे। अपनी तीखी तराशी हुई मूछों की बदौलत प्राण इंडस्ट्री के हॉट विलेन के रूप में पहचाने जाने लगे।