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मेरठिया गैंगस्टर्स: फिल्मी पर्दे पर मेरठ की नकारात्मक छवि ही क्यों?

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जरायम न मेरठ की धरती की पहचान है और न ही इस माटी के नौजवानों की कहानी गढ़ता है। क्रांति की इस धरा के वीरों ने तो अपने शौर्य और साहस के बूते देश का राज तिलक किया है। चाहे जंग का मैदान हो या खेलों का, मेरठी युवाओं ने हर क्षेत्र में मजबूती के साथ अपना दमखम दिखाया है। लेकिन, फिल्मकारों को न क्रांति धरा का गौरवशाली इतिहास नजर आता है और न ही देश का मान बढ़ाने वाले मेरठी। मेरठ ब्यूरो से शालू अग्रवाल की रिपोर्ट।
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मेरठिया गैंगस्टर्स: फिल्मी पर्दे पर मेरठ की नकारात्मक छवि ही क्यों?

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पहले ओमकारा, जॉली एलएलबी जैसी फिल्मों के जरिए मेरठ के प्रति अपने नकारात्मक नजरिये की नुमाइश की और अब मेरठिया गैंगस्टर्स में भी वही छवि पेश करने जा रहे हैं। ऐसे फिल्मकारों को आईना दिखाती देश की शान बढ़ाने वाले मेरठी शूरवीरों, नौजवानों और बेटियों की सफलता इसका सबूत हैं।
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मेरठिया गैंगस्टर्स: फिल्मी पर्दे पर मेरठ की नकारात्मक छवि ही क्यों?

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कमजोर आर्थिक स्थिति के बीच भी मेरठ की बेटी अन्नू रानी ने कॉमनवेल्थ गेम्स-2014 में देश का नाम बुलंद किया। नेशनल में रिकॉर्ड होल्डर, भाला फेंकने में माहिर अन्नू ने कॉमनवेल्थ गेम्स में कांस्य पदक जीता। इससे पहले भी अन्नू चार साल तक लगातार ऑल इंडिया यूनिवर्सिटी में गोल्ड मेडल लाईं।

मेरठिया गैंगस्टर्स: फिल्मी पर्दे पर मेरठ की नकारात्मक छवि ही क्यों?

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मेरठ के बेटे ही नहीं, यहां की बहुओं ने भी देश-विदेश में मेरठ का नाम ऊंचा किया है। मोदीपुरम निवासी सीमा पूनिया मेरठ की बहू हैं। सीमा ने हाल में हुए एशियन गेम्स में डिस्कस थ्रो में स्वर्ण पदक हासिल किया। कॉमनवेल्थ गेम्स में सिल्वर मेडल जीत चुकीं सीमा का खेलों में दुनिया में बड़ा नाम है। देश-विदेश में कई पदक अपने नाम कर चुकी हैं। अच्छे-अच्छे खिलाड़ी डिस्कस थ्रो में सीमा का लोहा मानते हैं।
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मेरठिया गैंगस्टर्स: फिल्मी पर्दे पर मेरठ की नकारात्मक छवि ही क्यों?

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मेरठ के क्रांतिकारियों ने इस देश को अंग्रेजों की गुलामी से आजाद कराया, तो सेना में तैनात लाड़लों ने दुश्मन से देश की रक्षा की। ललियाना निवासी 22 वर्षीय ग्रेनेडियर जुबेर अहमद छुट्टी रद्द कराकर सीमा पर दुश्मन के छक्के छुड़ाने जा पहुंचे थे। जुबेर की बूढ़ी मां आज भी गर्व से अपने बेटे का नाम लेते हुए कहती हैं, धन्य हूं मैं जो मुझे जुबेर जैसा बेट मिला। उसने अपनी जान देकर मातृभूमि का ऋण अदा किया। जुबेर कारगिल युद्ध में लड़ते हुए वीरगति को प्राप्त हुए थे।
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वर्ष-1999 में हुए कारगिल युद्ध में हस्तिनापुर के पाली गांव के योगेंद्र यादव का जज्बा किसी क्रांतिकारी से कम नहीं था। शहादत देने से पहले योगेंद्र ने 17 पाकिस्तानी फौजियों को मार गिराया। 18 साल की उम्र में देश रक्षा के लिए फौज में भर्ती हुए योगेंद्र ने तोलोलिंग की पहाड़ी से दुश्मन को खदेड़ा और तिरंगा फहराकर मातृभूमि की रक्षा की। युद्ध पर जाने से पहल योगेंद्र परिवार से वादा कर गए थे कि दुश्मनों का खात्मा करके ही लौटूंगा। आज योगेंद्र की पत्नी उर्मिला परिवार की देखभाल कर रही हैं।
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कारगिल युद्ध में शहीद मेजर मनोज तलवार का जज्बा हिमालय से ऊंचा और बुलंद था। 11 जून 1999 को 19 हजार फीट ऊंची चोटी टूरटोक लद्दाख में सैनिकों का नेतृत्व करते हुए मेजर मनोज चोटी पर चढ़े। पाकिस्तानी फौज को सामने देखकर भी मनोज के हौसले नहीं डगमगाए। दुश्मन का सामना करते हुए वीरगति को प्राप्त हुए। मेजर मनोज के पिता पीएल तलवार बेटे की शहादत को नहीं भूल सकते। वो कहते हैं, मेरठ की भूमि पर मेजर मनोज जैसे रणबांकुरों का जन्म हुआ है, जो इस माटी का गर्व हैं।

मेरठिया गैंगस्टर्स: फिल्मी पर्दे पर मेरठ की नकारात्मक छवि ही क्यों?

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विभाजन के बाद भारत-पाकिस्तान के बीच 1965 में हुई जंग में मोहनपुरी निवासी बेगराम सिंह ने दुश्मन की फौज के छक्के छुड़ा दिए थे। 1965 के युद्ध में बेगराम सिंह पीएसी कंपनी में कमांडर थे। फर्स्ट ए बटालियन इलाहाबाद में तैनात थे। युद्ध में घायल होने के बाद भी बेगराम ने मोर्चा संभाला और मैदान-ए-जंग में डटे रहे। पीएसी के वह यूपी के पहले ऐसे कमांडर हैं, जिन्हें राष्ट्रपति पदक मिला है।

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रोहटा रोड निवासी सीएसएम यशवीर सिंह 12 जून 1999 को तोलोलिंग की पहाड़ी पर पाकिस्तानी सेना को खदेड़कर वीरगति को प्राप्त हुए थे। भारत मां का यह लाल अपने पीछे पत्नी मुनेश और बच्चों को छोड़ गया। पत्नी मुनेश ने बताया, जैसे ही मेरे पति को जंग छिड़ने की खबर मिली, उन्होंने मुझसे कहा कि मुझे मातृभूमि बुला रही है। दुश्मन भारत मां पर मेरे रहते कब्जा नहीं कर सकता, मुझे जाना ही होगा। वो मैदान-ए-जंग में चले गए और देश की शान के लिए शहादत दे दी।
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कारगिल में शहीद हुए मेरठ के सतीश कुमार के नाम पर कारगिल में एक सड़क का नामकरण किया गया। इस सड़क से गुजरने वाले हर छोटे-बड़े की जुबान पर मेरठ की माटी में जन्मे सतीश का नाम होता है। सतीश चौक कंकरखेड़ा निवासी सतीश कुमार ने शादी के एक साल बाद ही जंग के मैदान में देश के लिए शहादत दे दी, मगर भारत मां पर आंच नहीं आने दी।
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