निर्देशक निखिल आडवाणी ने पायल-मैडी की जुदाई को दो घंटे तक तरह-तरह से इतना घिसा है कि कहानी में उतार-चढ़ाव नहीं रह जाते। दर्शक सोचता है कि निर्देशक दिखाना क्या चाहता है।
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तस्वीरेंः तीन दिनों तक एक-दूसरे को किस करते रहे ये हीरो-हीरोइन!
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अगर कट्टी बट्टी देखने की सोच रहे हैं तो पहले उसका क्लाइमेक्स जानते जाएं। ताकि बाद में ठगा हुआ न महसूस करें। कहानी है मुंबई में पांच साल तक सिरफिरी पायल (कंगना) के साथ लिव-इन में रहने के बाद सिरफिरे मैडी (इमरान) की। जिसका दिल टूट गया है। पायल झगड़ा कर छोड़ कर चली गई।
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...और फिर जब क्लाइमेक्स आता है तो कुछ लोगों की आंखें भर आती है। बेचारी पायल कैंसर से मर रही है! इसलिए दोस्तों की मदद से वह चाहती है कि मैडी उससे नफरत करने लगे!! बहुत सारे दर्शक निर्देशक की सोच पर रोने लगते हैं।
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जब लगता है कि वह नहीं रही, तभी आंखें खोल देती है! लेकिन आखिरकार कंगना आंखें मूंद लेती है और फिल्म खत्म हो जाती है। पूरा प्रसंग करुणा खोकर हास्य में बदल जाता है।
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निर्देशक ने कंगना के आखिरी महीनों के दृश्य च्युंगम जैसे चबाए हैं। यह दर्शक के धैर्य की कड़ी परीक्षा हैं। पायल बीमारी के अलग-अलग चरणों में अलग-अलग गेट-अप के साथ बार-बार लौटती है।
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सचिन-रंजीता स्टारर अंखियों के झरोखे से (1978) और आदित्य पंचोली-रुखसार स्टारर याद रखेगी दुनिया (1992) सहज ही याद आती हैं।
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नायक-नायिका के बीच किसी लाइलाज बीमारी के आने से प्रेम की त्रासदी पर पहले भी फिल्में बनी हैं।
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मगर मैडी उसे रह-रह कर याद कर रहा है। जगह-जगह ढूंढ रहा है। जबकि उसकी झक्की-सी बहन और दोस्त बार-बार समझा रहे हैं कि पायल को भूल जा। वह अपनी जिंदगी में आगे बढ़ गई। क्यों उसके लिए मर रहा है? मगर मैडी तो ‘मैड’ हुआ पड़ा है।