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रिलीज के ऐन पहले रोक दी गई ये फिल्म, वरना होता बड़ा बवाल

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पहले ये फिल्म पास कर दी गई थी, लेकिन रिलीज के ऐन पहले उस हडकंप आभाष हो गया, जो रिलीज के बाद होने वाला था। इसलिए तत्काल इसे रोक दिया गया है।
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रिलीज के ऐन पहले रोक दी गई ये फिल्म, वरना होता बड़ा बवाल

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फिल्म के निर्देशक सुखजिंदर सिंह शेरा ने बताया कि सेंसर बोर्ड ने उन्हें बीती 24 जुलाई को फिल्म प्रदर्शन की अनुमति दे दी थी और जरूरी स‌र्टिफिकेट भी पास कर ‌दिए थे, लेकिन...
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लेकिन अब उन्हें दोबारा बुलाकर मुबई में सलाहकार कमेटी की खास बैठक में बुलाकर फिल्म पर देशभर में प्रदर्शन पर रोक लगा दी गई। शेरा ने बताया कि सेंसर बोर्ड के सामने उन्होंने कई सीन काटने का भी प्रस्ताव रखा। लेकिन सेंसर बोर्ड ने उनसे कहा कि केंद्रीय गृह मंत्रालय और इंटैलिजेंस ब्यूरो इस फिल्म के प्रदर्शन के लिए तैयार नहीं हैं। क्योंकि...

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क्योंकि इसके रिलीज होने से देशभर में कानून व्यवस्‍था विगड़ने की आशंका है। पंजाब व अन्य राज्यों में अशांति भा इसलिए फिल्म पर इंडिया में बैन लगाया जाता है। निर्देशक शेरा ने बताया कि अब जब ये फिल्म कल यानि 11 सितंबर को रिलीज होने जा रही है ऐसे में अचानक बैन चौंकाने वाला है। उनका कहना है कि वे ‌अपनी फिल्म मो विदेशों में कल ही रिलीज कर दी जाएगी। आखिर है क्या इस फिल्म में...

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इस फिल्म का नाम है 'जिंदा सुखा'। हां जी, ये उन्हीं दोनों शख्सों के नाम के आखिरी दो शब्द हैं, जिन्होंने देश के एक सेना प्रमुख की हत्या कर दी थी। कांग्रेस नेताओं को मौत के घाट उतार दिया था और एक बैंक में तब तक की सबसे बड़ी डकैती डाली थी। लेकिन...
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लेकिन फिल्म में उनका महिमामंडन किया गया हैं। बल्कि उन्हें देशभक्त के तौर पर दिखाया गया है। दरअसल, कहानी ऑपरेशन ब्लू स्टार की है। जब तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल अरूण वैद्य के आदेश पर अमृतसर स्थिति स्वर्ण मंदिर पर सैनिक कार्रवाई की गई। और खालिस्तान समर्थक जनरैल सिंह भिंडरावाले और उनके समर्थकों से परिसर मुक्त करा लिया गया।
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इस ऑपरेशन से नाराज हरजिंद्र सिंह (जिंदा) और सुखदेव सिंह (सुक्खा) ने ऑपरेशन का आदेश देने वाले तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल अरूण वैद्य, ऑपरेशन के लिए दोषी माने जा रहे कांग्रेस सांसद ललित माकन व अर्जुन दास की हत्या कर दी।

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इसके बाद 1987 में हुई पंजाब नैशनल बैंक में तब तक की देश की सबसे बड़ी डकैती में भी दोनों आरोपी थे। इन आरोपों में दोनों को 1989 में पुणे के यरावदा जेल में फांसी चढ़ा दी गई। कहते हैं इसमें इंदिरा गांधी का हाथ था।

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लेकिन कहानी का दूसरा पहलू भी है। जिंदा सुखा की जिंदगी के उसी पहलू पर आधारित है ये फिल्म। जिसमें दिखाया गया है कि दोनों ने जो कदम उठाए वो राष्ट्रभक्ति की मिसाल पेश करता है।

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फिल्म पूर्व सेना प्रमुख के कत्ल, बैंक डकैती, पाक अलगाववाद, भारत और पाकिस्तान के पंजाब की असलीयत और उस दौरान सिखों के सभी भावनात्मक पहलू को उजागर किया गया है।
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ऐसे में ये अंदेशा लगाया जा रहा है कि फिल्म के रिलीज होने पर एक बार फिर गड़े मुर्दे उखड़ेंगे और लोगों के भावनाओं को चोट पहुंचेगी। यही नहीं, फिल्म में कांग्रेस के प्रमुख नेताओं के संबंध में दिखाई गई बातों से दंगे फसाद की भी आशंका है। इस‌लिए यह भारत की पहली फिल्म बनने जा रही है, जो भारत की होकर यहां रिलीज न होकर बल्कि दूसरे देशों में रिलीज होने जा रही है।
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