सिर पर सैलानियों के सामान का बोझ ढोने वाला एक दिन मुंबई का तीसरा बड़ा डॉन बन जाएगा, किसी को अंदाजा नहीं था। तस्वीरों में दास्तां।
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रेलवे कुली बना मायानगरी का तीसरा डॉन, जानिए कैसे?
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साठ के दशक में जब समंदर की सुर्ख लहरों पर सवार कार्गो जहाज हाजी मस्तान के इशारों से हरकत करते थे और साउथ सेंट्रल मुंबई में करीम लाला ही कानून और अदालत हो चले थे, तब मायानगरी के उत्तर-पूर्व इलाके में एक नए डॉन ने दस्तक दे दी थी। जिसे दुनिया ने वरदा भाई के नाम से जाना।
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मूल रूप से चेन्नई के थूथुकुडी के वरदराजन मुनिस्वामी मुदलियार ने उम्र के 34वें साल में जब मुंबई का रुख किया तो शुरुआती दिनों में वीटी स्टेशन पर कुली बनकर गुजर-बसर की।
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वीटी स्टेशन पर मद्रासी कुली को देख किसी को अंदाजा नहीं था कि जो हाथ बोझ उठा रहे हैं, वही एकदिन लोगों को दुनिया से उठाने लगेंगे।
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कमरतोड़ मेहनत के बाद भी मुफलिसी की मार ने वरदा को गुनाहों के रास्ते पर ला दिया। अवैध शराब की तस्करी से शुरा हुआ सफर कत्ल-ओ-गारत पर उतर आया। सुपारी लेकर हत्याएं करना, जुएं और शराब के अड्डे चलाना, ड्रग्स-सोने की तस्करी करना वरदा का पेशा गया।
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जरायम की दुनिया में पकड़ मजबूत होने के साथ ही वरदा की मुलाकात मुंबई के पहले डॉन हाजी मस्तान और दूसरे डॉन करीम लाला से हुई। वरदा, हाजी और करीम के बीच में अपने-अपने इलाकों में धंधा चलाने को लेकर समझौता हुआ। और तीनों की तिकड़ी मुबंई को अपने आगोश में ले लिया।
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सीएसटी स्टेशन पर कुलीगीरी के दौरान वरदा ने स्टेशन के पास बिस्मिल्लाह शाह बाबा की मजार पर मुफिलिसी के शिकार लोगों के लिए खाने का पंडाल लगाने की परंपरा शुरू की। इससे मजलूमों और जरूरतमंदों के एक तबके का वो मसीहा बन गया।
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एक तरफ पठान और मुस्लिम समुदाय के लिए करीम लाला और हाजी मस्तान मसीहा हो चले थे तो उधर वरदा भी मुंबई में रहने वाले प्रवासी तमिलों और पूरे तमिल समुदाय के लिए देवता हो चला था।
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वरदा ने गणेश चतुर्थी पर मटुंगा स्टेशन पर हर साल भव्य पंडाल लगवाया, इस पंडाल में बॉलीवुड समेत मुंबई की नामी हस्तियां भी पहुंचने लगीं।
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हाजी मस्तान और करीम लाला की तरह वरदा के प्रभाव से भी बॉलीवुड अछूता नहीं रह सका। वरदा के जीवन को भी हिंदी और साउथ की फिल्मों में जगह मिली। जिनमें विनोद खन्ना की दयावान वरदा के जीवन पर ही आधारित फिल्म है। वहीं बिग बी ने कहा था कि फिल्म अग्निपथ में उनकी भूमिका वरदा से ही प्रभावित थी।
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साल 1980 में पुलिस अधिकारी वाईसी पवार ने वरदा के धंधों पर शिकंजा कसना शुरू कर दिया। वरदा के आदमी कानून की पकड़ में आने लगे। उधर वरदा बूढ़ा हो चला था। इसलिए वो चेन्नई वापस चला गया।
साल 1988 में दिल का दौरा पड़ने से वरदा की मौत हो गई। तब हाजी मस्तान वरदा की लाश को एयर इंडिया के चार्टर्ड विमान से मुंबई ले आए जहां वरदा की आखिरी इच्छा के अनुसार अंतिम संस्कार किया गया। वरदा की मौत से पूरे मटुंगा, धारावी समेत कई इलाकों में शोक की लहर दौड़ गई थी।